Sunday, October 20, 2019

Some Useful Information About Eating and Drinking

*प्राकृतिक चिकित्सा - ८*

*तीव्र रोग और जीर्ण रोग*

प्राकृतिक चिकित्सा में रोगों को दो वर्गों में बाँटा जाता है- तीव्र रोग (acute disease) और जीर्ण रोग (chronic diseases)।

तीव्र रोग ऐसे रोगों को कहा जाता है जो अचानक होते हैं, रोगी को बहुत कष्ट देते हैं और कुछ दिनों में चले जाते हैं। उल्टी, दस्त, सर्दी, ज़ुकाम, खाँसी, बुखार, विभिन्न प्रकार के दर्द आदि तीव्र रोग कहे जाते हैं।

जीर्ण रोग ऐसे रोगों को कहा जाता है जो धीरे-धीरे विकसित होते हैं और लम्बे समय तक बने रहते हैं। रोगी उनके साथ ही जीना सीख लेता है। कभी कभी ये रोग जीवन भर  रोगी का पीछा नहीं छोड़ते। मधुमेह (डायबिटीज़), रक्तचाप (ब्लडप्रैशर), हृदय रोग, गठिया, बवासीर, हार्निया, साइटिका, मोटापा, लकवा, एसिडिटी, मिर्गी, बहरापन, दमा (अस्थमा), पागलपन, गुर्दों के रोग आदि कुछ जीर्ण रोग हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा का मानना है कि प्रकृति हमारे शरीर को रोगमुक्त करने का कार्य स्वयं करती है। इसलिए तीव्र रोग जैसे उल्टी, दस्त, जुकाम, बुखार, दर्द आदि शरीर के विकारों को निकालने के प्रकृति के प्रयास हैं। यदि हम इन प्रयासों में प्रकृति की सहायता करते हैं, तो बहुत शीघ्र रोगमुक्त हो सकते हैं और आगे हो सकने वाले बड़े रोगों से भी बचे रह सकते हैं। लेकिन यदि हम इन प्रयासों में बाधा डालते हैं, तो वे विकार निश्चय ही किसी अन्य रूप में या बड़े रोग के रूप में बाहर निकलेंगे, जिससे हमें अधिक कष्ट उठाना पड़ेगा।

हमारे अस्वस्थ होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे शरीर के मल निकालने वाले अंग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करते। हम उन पर कार्यों का इतना बोझ लाद देते हैं कि वे थक जाते हैं और शिथिल हो जाते हैं। अधिकांश रोग पेट की खराबी कब्ज के कारण होते हैं। जब हमारा खान- पान असंतुलित होता है, हम हानिकारक वस्तुएँ खाते हैं या खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खा जाते हैं, तो हमारी आँतों पर भोजन पचाने में बहुत भार पड़ता है। वे भोजन को ठीक प्रकार से पचा नहीं पातीं और उनके द्वारा बने हुए मल का निष्कासन भी समय से नहीं हो पाता। इससे बचा हुआ मल आँतों में ही चिपक जाता है और सड़ता रहता है। इसी को कब्ज कहते हैं और यही अधिकांश रोगों का मूल कारण होता है।

इसी प्रकार जब हम हानिकारक पेय पदार्थ जैसे चाय, काफी, कोल्ड ड्रिंक आदि अधिक पीते हैं और पानी कम पीते हैं, तो हमारे गुर्दों पर कार्य का बोझ बहुत बढ़ जाता है और मूत्र पर्याप्त मात्रा में नहीं बनता। इससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। नमक का अधिक सेवन भी गुर्दों का कार्य बढ़ा देता है।

लहमारे शरीर के बहुत से विकार त्वचा से पसीने के रूप में निकलते हैं। जब हम पर्याप्त शारीरिक श्रम या व्यायाम नहीं करते, तो पसीना कम निकलता है। साथ ही तरह-तरह के केमिकलों से बने हुए साबुन से स्नान करने के कारण रोम छिद्र बन्द हो जाते हैं, जिससे पसीना नहीं निकल पाता। वे विकार त्वचा के भीतर एकत्र होते जाने के कारण कई प्रकार के चर्म रोग जैसे फोड़े, फुंसी, दाद, खाज, सफेद दाग आदि पैदा हो जाते हैं।

इसी प्रकार कफ को शरीर में ही रोक देने के कारण खाँसी, जुकाम, ब्रोंकाइटिस, साइनस, दमा आदि अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। ये सभी विकार खून में भी मिलते रहते हैं, जिससे उच्च या निम्न रक्तचाप, हृदय रोग, क्षय रोग आदि हो जाते हैं।

कई बार जुकाम हो जाने पर डाक्टर लोग ऐसे कैप्सूल दे देते हैं, जिनसे कफ का निकलना रुक जाता है। रोगी समझता है कि जुकाम ठीक हो गया, परन्तु वास्तव में कफ शरीर में ही एकत्र होता रहता है और बाद में किसी नए रूप जैसे ब्रोंकाइटिस, साइनस, दमा आदि रोगों के रूप में सामने आता है। एक व्यक्ति कई दिनों से जुकाम से पीड़ित था और सो नहीं पा रहा था। एक डाक्टर ने कोई तेज दवा दे दी, जिससे जुकाम रुक गया और रोगी को अच्छी नींद आयी। वह रोगी कहने लगा कि आज मैं बहुत गहरी नींद सोया हूँ। किसी जानकार ने इस पर टिप्पणी की कि आज तुमने दमा का बीज बो दिया है।

वास्तव में बड़े-बड़े रोग शरीर में इसलिए हो जाते हैं कि हम छोटे-छोटे रोगों को अर्थात् उनके लक्षणों को दबा देते हैं और उनके मूल कारणों को दूर करने की कोशिश नहीं करते। यदि हम छोटे-छोटे रोगों को दबायें नहीं और उन्हें अपना कार्य करने दें, तो बड़े या जीर्ण रोग होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

कहने का तात्पर्य है कि तीव्र रोगों को दवाइयाँ खाकर दबाने और विकारों या विजातीय द्रव्यों को शरीर से बाहर न निकलने देने पर ही तमाम तरह के जीर्ण रोग पैदा होते हैं। यदि हम अपने मल निष्कासक अंगों पर अनावश्यक बोझ न डालें और उनके कार्यों में सहायता करें, तो हमारा शरीर सरलता से रोगमुक्त हो सकता है और सदा स्वस्थ बना रह सकता है। यही प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान का मूल आधार है।
*प्राकृतिक चिकित्सा - ९*

*स्वास्थ्य के लिए भोजन*

भोजन जीवन के लिए एक अति आवश्यक वस्तु है। भोजन से हमारे शरीर को पोषण प्राप्त होता है और उसमें होेने वाली कमियों की भी पूर्ति होती है। भोजन के अभाव में शरीर की शक्ति नष्ट हो जाती है और जीवन संकट में पड़ जाता है।

भोजन का स्वास्थ्य से बहुत गहरा सम्बंध है। भोजन करना एक अनिवार्य कार्य है। इसी प्रकार हम अन्य कई अनिवार्य कार्य करते हैं, जैसे साँस लेना, मल त्यागना, मूत्र त्यागना, स्नान करना, नींद लेना आदि। इन कार्यों में हमें कोई आनन्द नहीं आता, परन्तु भोजन करने में हमें आनन्द आता है। इससे भोजन करना हमें बोझ नहीं लगता, बल्कि आनन्ददायक अनुभव होता है। लेकिन अधिकांश लोग स्वाद के वशीभूत होकर ऐसी वस्तुएँ खाते-पीते हैं, जो शरीर के लिए बिल्कुल भी आवश्यक नहीं हैं, बल्कि हानिकारक ही सिद्ध होती हैं। भोजन का उद्देश्य शरीर को क्रियाशील बनाए रखना होना चाहिए। परन्तु अधिकांश लोग जीने के लिए नहीं खाते, बल्कि खाने के लिए ही जीते हैं। ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग ही प्रायः बीमार रहते हैं।

हमारे अस्वस्थ रहने का सबसे बड़ा कारण गलत खानपान होता है। यदि हम अपने भोजन को स्वास्थ्य की दृष्टि से संतुलित करें और हानिकारक वस्तुओं का सेवन न करें, तो बीमार होने का कोई कारण नहीं रहेगा। हानिकारक वस्तुओं का सेवन करने पर ही रोग उत्पन्न होते हैं और उनका सेवन बन्द कर देने पर रोगों से छुटकारा पाना सरल हो जाता है। कई प्राकृतिक तथा अन्य प्रकार के चिकित्सक तो केवल भोजन में सुधार और परिवर्तन करके ही सफलतापूर्वक अधिकांश रोगों की चिकित्सा करते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में तो खान-पान का सबसे अधिक महत्व है। इसमें किसी दवा का सेवन नहीं किया जाता, बल्कि भोजन को ही दवा के रूप में ग्रहण किया जाता है और इतने से ही व्यक्ति स्वास्थ्य के मार्ग पर चल पड़ता है।

एक कहानी में स्वास्थ्य की कुंजी इस प्रकार दी गई है- *हित भुक्, ऋत भुक्, मित भुक्* अर्थात् ”हितकारी भोजन करना, ऋतु अनुकूल तथा न्यायपूर्वक प्राप्त किया हुआ भोजन करना और अल्प मात्रा में भोजन करना“। ये तीनों ही शर्तें बराबर महत्व की हैं। यदि हम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुओं का सेवन करेंगे, तो अवश्य ही हानि उठायेंगे। इसलिए भोजन में स्वास्थ्य के लिए हितकारी वस्तुएँ ही होनी चाहिए। अब यदि वस्तु हितकारी है, परन्तु ऋतु के अनुकूल नहीं है, तो भी हानिकारक होगी। इसलिए भोजन ऋतु के अनुकूल होना चाहिए। हितकारी और ऋतु अनुकूल भोजन भी यदि अधिक मात्रा में किया जाय, तो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, क्योंकि उसके पाचन में शरीर असमर्थ और कमजोर हो जाता है। इसलिए हितकारी और ऋतु अनुकूल वस्तुएँ भी अल्प मात्रा में ही सेवन करनी चाहिए, तभी हम स्वस्थ रह सकेंगे।

यह भी महत्वपूर्ण है कि हम जो भी खायें, वह न्यायपूर्वक प्राप्त किया हुआ होना चाहिए। यदि कोई खाद्य पदार्थ हमने चोरी या बेईमानी से, किसी को सताकर, दुःख पहुँचाकर, छीना-झपटी से या हिंसा करके प्राप्त किया हो, तो वह चाहे कितना भी स्वादिष्ट या पौष्टिक क्यों न हो, किन्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं हो सकता। देर-सवेर उसका दुष्प्रभाव हमारे तन-मन पर अवश्य पडे़गा। कहावत भी है कि ‘जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन’। जो लोग बिना परिश्रम किये और झूठ या बेईमानी या भ्रष्टाचार से धन एकत्र कर लेते हैं, वे चाहे कितना भी अच्छा भोजन कर लें, लेकिन सदा बीमार ही रहेंगे और अन्यायपूर्वक कमाया हुआ उनका धन बीमारियों के इलाज में ही व्यय होगा। *बेईमानी के धन से सुख और स्वास्थ्य की आशा करना मूर्खता है।*

हम जो भी खाते-पीते हैं, उसको पचाने में हमारे शरीर को परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए हमें ऐसी वस्तुएँ ही खानी चाहिए, जो सुपाच्य हों और जिनको पचाने में शरीर की शक्ति का अधिक व्यय न हो। अत्यधिक तले-भुने और मसालेदार भोजन को पचाने में हमारी बहुत शक्ति खर्च हो जाती है, इसलिए जहाँ तक सम्भव हो ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए। माँसाहार और अंडाहार भी स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हैं। इसलिए भले ही हमें भूखा रहना पड़े, इनका सेवन कदापि नहीं करना चाहिए।

बहुत से लोग अंडा और दूध को एक ही श्रेणी में रखते हैं, क्योंकि दोनों ही वस्तुएँ पशुओं से प्राप्त की जाती हैं। परन्तु यह बहुत बड़ी भूल है, क्योंकि दूध जहाँ प्रकृति माता का बच्चों के लिए तरल भोजनरूपी उपहार है, वहीं अंडा एक भ्रूण होता है। भ्रूण कदापि सेवनीय नहीं हो सकता, भले ही उसमें कितने भी पौष्टिक तत्व क्यों न हों। जहाँ दूध और उससे बने पदार्थ घी, दही, मठा आदि स्वास्थ्य के लिए अमृत समान होते हैं, वहीं अंडा और उससे बनी वस्तुएँ जहर के समान हैं। इसलिए इनसे बचना चाहिए।

संक्षेप में, हमारे भोजन का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य का निर्माण करना और रोगों से बचे रहना होना चाहिए।
*प्राकृतिक चिकित्सा - १०*

*भोजन कितना करें और कैसे?*

इस लेखमाला की पिछली कड़ी में हमने विस्तार से इसकी चर्चा की है कि हमें भोजन में केवल वे ही वस्तुएँ लेनी चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हों और रोगों से बचने में सहायक हों। यह प्रश्न फिर भी रह जाता है कि भोजन कितना किया जाये, क्योंकि यदि लाभदायक वस्तु भी आवश्यकता से अधिक मात्रा में खायी जाये, तो वह अन्तत: हानिकारक ही सिद्ध होती है।

इसलिए हम जो भी खायें वह अल्प मात्रा में ही खायें। परन्तु अधिकतर होता यह है कि स्वाद के वशीभूत होकर हम आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ खा जाते हैं, जिन्हें हमारी पाचन प्रणाली अच्छी तरह पचा नहीं पाती। विवाह-शादियों और पार्टियों में प्रायः ऐसा देखा जाता है। एक तो वहाँ पचने में भारी वस्तुओं की भरमार होती है, दूसरे उन्हें भी लोग ठूँस-ठूँसकर खा लेते हैं। इससे पेट में विकार उत्पन्न होते हैं और हम चूरन-चटनी के सहारे उस भोजन को पचाने का प्रयास करते हैं।

कई विद्वानों ने सही कहा है कि हम जो खाते हैं, उसके एक तिहाई से हमारा पेट भरता है और दो तिहाई से डाक्टरों का। इसका तात्पर्य यही है कि हमारे जीवन के लिए अल्प मात्रा में भोजन ही पर्याप्त है और उससे अधिक खाने पर विकार ही उत्पन्न होते हैं। उनके इलाज में धन व्यय होता है, जिससे डाक्टरों को अच्छी आमदनी होती है। इसलिए यह बात गाँठ बाँध लीजिए कि कोई वस्तु चाहे कितनी भी स्वादिष्ट क्यों न हो और भले ही मुफ्त क्यों न मिली हो, उतनी ही मात्रा में खानी चाहिए, जितनी हम सरलता से पचा सकें। अधिक खाना ही बीमारियों का सबसे बड़ा कारण है। किसी ने सही कहा है कि *खाने के अभाव से उतने लोग नहीं मरते, जितने ज्यादा खाने से मरते हैं।*

भोजन के सम्बंध में एक अति महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जो भी खा रहे हों उसे खूब चबा-चबाकर खाना चाहिए। अधिक चबाने से उसमें कई ऐसे रस मिल जाते हैं, जो पाचन में बहुत सहायक होते हैं। कुछ विद्वानों ने तो यहाँ तक कहा है कि प्रकृति ने हमारे मुँह में बत्तीस दाँत इसलिए दिये हैं कि हम प्रत्येक कौर को 32 बार चबाकर खायें। अच्छी तरह चबाये बिना भोजन को निगल जाने पर उसे पचाने का कार्य आँतों को करना पड़ता है, जिससे हमारी पाचन शक्ति धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है और मलनिष्कासक अंग भी ठीक प्रकार से कार्य नहीं करते। इससे कब्ज पैदा होता है और उससे तमाम बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए दाँतों का कार्य आँतों से लेना गलत है।

खूब चबाकर खाने से भोजन की मात्रा पर अपने आप नियंत्रण हो जाता है, क्योंकि अच्छी तरह चबाने से कम भोजन में ही पेट भर जाता है। अच्छी तरह चबाकर खायी गयी एक रोटी जल्दी-जल्दी खायी गयी चार रोटियों से अधिक पौष्टिक होती है। इसलिए हमें खूब चबाकर खाना चाहिए और भूख से थोड़ा कम ही खाना चाहिए।

अब प्रश्न उठता है कि भोजन कितनी बार करना चाहिए। कई लोग दिन में कई बार कुछ-न-कुछ खाते ही रहते हैं। यह भी बीमारियों को निमंत्रण देने के समान है। सामान्यतया हमें दिन में केवल दो बार भोजन करना चाहिए। सामान्य रूप से मैं नाश्ता करने के पक्ष में नहीं हूँ। मेरा विचार यह है कि दोपहर भोजन से पूर्व जहाँ तक सम्भव हो, कोई ठोस वस्तु नहीं लेनी चाहिए। यदि नाश्ता करना आवश्यक ही हो, तो हल्का और सुपाच्य तरल आहार लेना चाहिए, जैसे दूध, मठा, दलिया, अंकुरित अन्न, फल आदि। कहावत है कि ‘एक बार खाये योगी, दो बार खाये भोगी और तीन बार खाये रोगी’। इसका तात्पर्य भी यही है कि दो बार से अधिक भोजन करने वाला प्रायः रोगी बना रहता है।

इसलिए जहाँ तक सम्भव हो, हमें केवल दो बार ही पूर्ण आहार करना चाहिए। दो भोजनों के बीच में कम से कम 6 घंटों का अन्तर अवश्य होना चाहिए। कभी कभी हमें भोजन करने के तीन-चार घंटे बाद ही भूख लग आती है। वह कच्ची भूख होती है। उस समय कुछ भी खाना उचित नहीं है। सबसे अच्छा यह रहेगा कि एक गिलास जल या किसी फल का जूस पी लिया जाये। इस सम्बंध में सबसे सुनहरा नियम यह है कि जब तक कड़ी भूख न लगे, तब तक कुछ भी मत खाइये। बिना भूख के खाना या कम भूख में खाना मुसीबत बुलाने के समान है।

रात्रि का भोजन सोने से कम से कम दो-तीन घंटे पूर्व अवश्य कर लेना चाहिए। लोग इस नियम को सबसे अधिक तोड़ते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम भोगते हैं। प्रायः यह देखा जाता है कि लोग रात्रि में 10-11 बजे भोजन करते हैं और फिर उसके तुरन्त बाद सो जाते हैं। इससे भोजन को पचने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता और वह रातभर बिना पचे पेट में पड़ा रहता है। इससे बहुत प्रकार की बीमारियाँ पैदा होती हैं और लोगों के पेट भी लटक जाते हैं। नव विवाहित युगलों में यह प्रवृत्ति सबसे अधिक पायी जाती है, इसलिए उनके पेट बहुत जल्दी ही लटकने लगते हैं। लटके हुए पेट स्वास्थ्य और सौन्दर्य के शत्रु होते हैं। ऐसे लोगों की आयु भी अल्प होती है और वे प्रायः तरह-तरह की बीमारियों से पीड़ित रहते हैं।

इसलिए यदि आप पेट को बाहर निकलने से बचाना चाहते हैं, तो रात्रि का भोजन 7-8 बजे तक अवश्य कर लें और यदि कभी देर हो जाये, तो कम मात्रा में भोजन करें या बिल्कुल न करें। रात्रि को देर से भोजन करने वालों को नाश्ता भूलकर भी नहीं करना चाहिए और दूसरे दिन दोपहर 12 बजे से पूर्व जल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाना-पीना चाहिए। इससे वे बहुत से दुष्प्रभावों से बचे रह सकते हैं। जिनका पेट पहले से लटका हुआ है, वे भी इन नियमों का पालन करके अर्थात् नाश्ता छोड़कर और थोड़ा सा शारीरिक व्यायाम करके उससे कुछ महीनों में ही छुटकारा पा सकते हैं।



*प्राकृतिक चिकित्सा - ११*

*भोजन कितना करें एवं कैसे (जारी)*

इस लेखमाला की पिछली कड़ी १० में हमने इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा की थी। कुछ पाठक मित्रों ने हमसे इस विषय पर और अधिक गहन चर्चा का अनुरोध किया है। इसलिए हम इस विषय पर कुछ अन्य विचार भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

भोजन ग्रहण करने का समय हमें स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है। भोजन करने के निर्धारित समय का पालन जहाँ तक सम्भव हो अवश्य करना चाहिए। प्राचीन आयुर्वेदाचार्य एवं शोधकर्ता महर्षि वागभट्ट ने लगभग 3 हजार वर्ष पहले ‘भोजन कब करें’ विषय पर बहुत शोधकार्य किया था। वे लिखते हैं कि दो वर्ष तक इस विषय पर गहन शोध के बाद वे इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि भोजन का समय सदैव निर्धारित होना चाहिए।

भोजन करने का समय हमारे शरीर की जठराग्नि (भोजन पचाने की आग) के अधिकतम होने के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए। यह सूर्योदय के ढाई घंटे बाद तक प्रबल होती है और सूर्यास्त के बाद कम हो जाती है। हमारी परम्पराओं, योग तथा पक्षियों की भोजन आदतों के अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि प्राणियों की पाचनशक्ति धूप के समय प्रबल रहती है।

अतः आधुनिक जीवनशैली में बदले परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए हम भोजन का समय निम्न प्रकार निर्धारित कर सकते हैं- नाश्ता प्रातःकाल 8 बजे से 9 बजे तक, दोपहर का भोजन दोपहर बाद 1 बजे से 2 बजे तक और रात्रि भोजन का आदर्श समय सायंकाल 6 बजे से 7 बजे तक है। आवश्यकता के अनुसार इसमें अधिकतम 30 मिनट तक छूट ली जा सकती है।
हमें अपने दैनिक भोजन की तीन-चौथाई मात्रा नाश्ते तथा दोपहर के भोजन में ग्रहण कर लेनी चाहिए और केवल एक-चौथाई मात्रा रात्रि भोजन में रखनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, हम सारांश में कह सकते हैं कि मात्रा और पोषण तत्वों की गुणवत्ता के अनुसार नाश्ता किसी राजा की तरह करना चाहिए, दोपहर का भोजन किसी युवराज की तरह और रात्रि भोजन किसी फकीर या भिखारी की तरह करना चाहिए। किसी भी स्थिति में कहीं भी, कभी भी, और भूख के बिना खाने को अपनी आदत नहीं बनाना चाहिए।

स्वस्थ जीवन जीने के लिए भोजन कैसे करें यह भी अति महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद के तीन प्रमुख ग्रंथों में से एक ’सुश्रुत संहिता’ के अनुसार- ”किसी उठे हुए स्थान पर सुविधापूर्वक बैठकर, समान स्थिति में रहते हुए और भोजन पर ध्यान केन्द्रित करके उचित समय पर (अर्थात् जब जठराग्नि प्रबल हो और वास्तविक भूख लग रही हो), उचित मात्रा में (अपनी पाचन शक्ति के अनुसार) भोजन करना चाहिए।“

इसी प्रकार मानसिक कार्य करने वालों को सुखासन में और शारीरिक श्रम करने वालों को कागासन में (उकड़ूँ) बैठकर भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन की मेज-कुर्सी की अवधारणा यूरोपीय है, क्योंकि वहाँ की जलवायु ठंडी है और इसका हमारी परिस्थितियों से सामंजस्य नहीं बैठता है। भारतीय परिस्थितियों में भोजन किसी आसन पर बैठकर किया जाता है और भोजन को किसी उठे हुए स्थान जैसे चैकी पर रखा जाता है। यदि किसी को चैकी-आसन के प्रयोग में असुविधा हो, तो वे कुर्सी पर सुखासन में (पालथी मारकर) बैठ सकते हैं और भोजन को डाइनिंग टेबल पर रख सकते हैं।

भोजन को छुरी-काँटे और चम्मच के बिना हाथ से करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ऐसा करने से शरीर में पाँचों तत्वों (पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि) का संतुलन बना रहता है, जिसका परिणाम होता है- स्वास्थ्य। भोजन प्रसन्नतापूर्वक मौन रहकर करना चाहिए ताकि पर्याप्त मात्रा में लार का निर्माण हो। उल्लेखनीय है कि लार आयु प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और पाचन में सहायता करती है। इसका निर्माण प्रत्येक कौर को कम से कम 32 बार अर्थात् अच्छी तरह चबाने से पर्याप्त मात्रा में होता है। चबाते समय अपने मुख को बन्द रखें और आवाज न करें। हर बार छोटे-छोटे कौर तोड़कर खाइए ताकि आप सरलता से मसाँस ले सकें और कौर को बिना कठिनाई के चबा सकें। शांत रहना और इस पर ध्यान देना भी सहायक होता है कि आप क्या खा रहे हैं, बजाय सबकुछ निगल जाने के। खाते समय बात करना, टीवी देखना या पढ़ना भी उचित नहीं है।

महर्षि वागभट्ट ने सही कहा था- ”जिस भोजन को बनाने में सूर्य के प्रकाश एवं पवन का स्पर्श न हुआ हो, वह विष के समान है।“ इसलिए इस बात का ध्यान रखिए कि भोजन बनाने का कार्य इन दो मौलिक और महत्वपूर्ण तत्वों हवा और धूप की उपस्थिति में ही किया जाये।

अगली कड़ियों में हम तरल पदार्थों विशेषतया जल ग्रहण करने का एवं भोजन न करने (उपवास) का स्वास्थ्य से सम्बन्ध
पर विचार करेंगे।


*प्राकृतिक चिकित्सा - १२*

*जल कितना पियें और कैसे*

भोजन के साथ-साथ जल की चर्चा करना अति आवश्यक है। प्रायः लोग पानी को पीने लायक वस्तु नहीं मानते और बहुत प्यास लगने पर ही पानी पीते हैं। इसके स्थान पर वे तरह-तरह की तरल वस्तुएँ चाय, काॅफी, कोल्ड ड्रिंक आदि पीते रहते हैं। ऐसे लोग बहुत गलतियाँ कर रहे हैं, जिनका कुपरिणाम उन्हें आगे चलकर भुगतना पड़ता है, क्योंकि ये वस्तुएँ जल का स्थानापन्न नहीं हैं, बल्कि जल पीने की आवश्यकता और अधिक बढ़ा देती हैं।

जल केवल हमारी प्यास ही नहीं बुझाता, बल्कि हमारा स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए भी अनिवार्य है। जिस प्रकार हम स्नान द्वारा अपने शरीर की बाहर से सफाई करते हैं, उसी प्रकार शरीर की अन्दर से सफाई के लिए जल पिया जाता है। यह हमारे भोजन और रक्त को छानकर उनसे हानिकारक पदार्थों को दूर करने में बहुत सहायक होता है। वे पदार्थ मूत्र द्वारा हमारे शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

वैसे भी हमारे शरीर का 70 प्रतिशत भाग जल ही है। उसका बहुत सा भाग मूत्र और पसीने के रूप में शरीर से निकलता रहता है, जिसकी पूर्ति होना आवश्यक है। जल के अभाव में हमारे शरीर की बहुत सी क्रियायें मन्द हो जाती हैं या रुक जाती हैं, जो जीवन के लिए हानिकारक होता है। हम भोजन के बिना महीनों तक जीवित रह सकते हैं, लेकिन पानी के बिना कुछ दिन भी जीवित रहना लगभग असम्भव है। इसलिए हमें हर मौसम में हर जगह नियमित अन्तराल पर जल पीने का ध्यान रखना चाहिए।

यह बात हमेशा याद रखें कि पीने का जल अधिक ठंडा या गर्म न हो। जाड़ों में कभी कभी हम गुनगुना जल पी सकते हैं, लेकिन अन्य सभी दिनों में वह साधारण शीतल होना चाहिए। फ्रिज आदि का अधिक ठंडा जल स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है। इसलिए यथासम्भव इससे बचना चाहिए। यदि विवशता में फ्रिज का जल पीना ही पड़े तो उसमें बराबर का साधारण जल मिलाकर उसका तापमान बढ़ा लेना चाहिए। पीने के लिए जल हमेशा साधारण ठंडा होना चाहिए। अति शीतल और अति गर्म वस्तुएँ खाना या पीना पाचन शक्ति के लिए हानिकारक होता है।

पीने के पानी की मात्रा भी बहुत महत्वपूर्ण है। किसी स्वस्थ वयस्क व्यक्ति को ढाई-तीन लीटर जल प्रतिदिन अवश्य पी लेना चाहिए। इसका एक सुनहरा नियम यह हो सकता है कि हम हर घंटे या सवा घंटे पर एक गिलास (लगभग एक पाव) पानी पियें, जैसे 6 बजे, 7 या सवा 7 बजे, 8 या साढ़े 8 बजे आदि। इस प्रकार यदि आप दिन में 16 घंटे जगे रहते हैं, तो दिनभर में 12 गिलास या 3 लीटर पानी हो जायेगा। यह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है। इसको शब्दों में नहीं बताया जा सकता। इसका केवल अनुभव ही किया जा सकता है।

जल पीने के साथ नियमित मूत्र विसर्जन करना भी अनिवार्य है। जितनी बार आप जल पीते हैं, यदि उतनी बार मूत्र विसर्जन के लिए जाना पड़े तो भी कोई चिन्ता की बात नहीं है। जल पीने के लगभग 45 मिनट से 1 घंटे बार मूत्र के दवाब का अनुभव होता है। यदि मूत्र विसर्जन की सुविधा हो, तो उसी समय मूत्र विसर्जन कर आना चाहिए। मूत्र को अधिक देर तक रोकना बहुत हानिकारक होता है। एक बात और ध्यान रखें कि मूत्र विसर्जन स्वाभाविक रूप से होना चाहिए, उसके लिए जोर बिल्कुल न लगायें, क्योंकि जोर लगाकर मूत्र त्यागने से मूत्राशय की सूजन, जलन आदि समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं। स्वाभाविक रूप से मूत्र विसर्जन करने पर ये समस्याएँ नहीं होतीं और यदि पहले से हैं तो ठीक हो जाती हैं।

बहुत से डाॅक्टर अधिक जल पीने को हानिकारक बताते हैं। वे प्रतिदिन दो-ढाई लीटर से अधिक जल पीने से मना करते हैं। यह गलत है। मेरा अनुभव है कि यदि आप नियमित अंतराल पर जल पीते हैं और समय पर मूत्र विसर्जन कर आते हैं, तो प्रतिदिन चार लीटर तक जल पीना भी हानिकारक नहीं है, बल्कि बहुत लाभदायक होता है। कई बार शरीर की सफाई के लिए प्रतिदिन चार लीटर जल पीना आवश्यक होता है। इससे अधिक जल पीने की सलाह मैं किसी को नहीं देता।

एक बात ध्यान रखें कि एक बार में सामान्यतया एक गिलास जल ही पीना चाहिए। यदि बहुत अधिक प्यास लगी है, तो डेढ़ गिलास (लगभग 400 मिलीलीटर) तक जल पी सकते हैं, परन्तु इससे अधिक नहीं। यदि इससे प्यास नहीं बुझती, तो आधा-पौन घंटा बाद फिर जल पी सकते हैं। कई लोग सुबह उठते ही एक साथ चार-पाँच गिलास जल पीने की सलाह देते हैं। यह भी हानिकारक होता है। मेरे विचार से सुबह पहली बार अधिकतम दो गिलास जल पी सकते हैं, उसके बाद हमेशा एक-एक गिलास ही पीना चाहिए।

ऐलोपैथिक डाॅक्टर गुर्दे के रोगियों को जल पीने से मना करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार जल पीने से गुर्दों का काम बढ़ जाता है। यह विचार बहुत भयंकर है, क्योंकि ऐसा करने से गुर्दे धीरे-धीरे निष्क्रिय होकर पूरी तरह खराब हो जाते हैं। फिर उनके पास डायलाइसिस कराने और आगे चलकर गुर्दा बदलवाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता। मेरे विचार से खराब गुर्दे के रोगियों को प्रतिदिन दो से ढाई लीटर जल थोड़ा थोड़ा करके अवश्य पीना चाहिए, ताकि गुर्दे सक्रिय बने रहें। मैंने सही मात्रा में इस प्रकार जल पिलाकर गुर्दे के रोगियों को स्वस्थ किया है, जिनको पहले डायलाइसिस कराना पड़ता था।

यहाँ यह बताना आवश्यक है कि भोजन के तुरन्त पहले और तुरन्त बाद जल पीना हानिकारक होता है। खाने के ठीक पहले पानी पीने से भूख कम होती है और ठीक बाद पीने से पाचन शक्ति खराब होती है और गैस बनती है। इसके बजाय भोजन के एक घंटे पहले और एक-डेढ़ घंटे बाद इच्छानुसार जल पीना चाहिए। खाने के बीच में प्यास लगने पर एक-दो घूँट पानी पिया जा सकता है। पानी पीने के सम्बंध में सबसे सुनहरा नियम यह है कि जब भी प्यास लगे पानी अवश्य पीना चाहिए। इसके अलावा कुछ परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें जल पीना वर्जित किया गया है। फल खाने के बाद, कोई अन्य तरल पदार्थ पीने के बाद और धूप में से आने पर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए। इनके आधा घंटे बाद जल पिया जा सकता है।

भोजन और जल के सम्बंध में एक सुन्दर दोहा प्रचलित है, जिसमें सुन्दर स्वास्थ्य का रहस्य छिपा हुआ है। यह दोहा निम्न प्रकार है-
भोजन को आधा करो, दुगुना पानी पीव।
चैगुन श्रम अठगुन हँसी, वर्ष सवा सौ जीव।।

-- *डॉ विजय कुमार सिंघल*
प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य
मो. 9919997596
कार्तिक कृ 8, सं 2076 वि (21 अक्तूबर, 2019)

Sunday, October 13, 2019

खाँसी की प्राकृतिक चिकित्सा

*खाँसी की प्राकृतिक चिकित्सा*

सूखी या गीली दोनों तरह की खाँसी का कारण है पुराना क़ब्ज़ और फेंफडों में विकार एकत्र होना। इनको दूर करने के लिए निम्नलिखित कार्य करें-
१. सुबह उठते ही एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़कर और एक चम्मच शहद मिलाकर पियें। फिर ५ मिनट बाद शौच जायें।
२. शौच के बाद ५-७ मिनट का ठंडा कटिस्नान लें अथवा २-३ मिनट पेडू पर खूब ठंडे पानी में तौलिया भिगोकर पोंछा लगायें और उसके बाद डेढ़ दो किमी या आधा-पौन घंटा तेज़ चाल से टहलें।
३. टहलने के बाद फेंफडों को साफ़ करने के लिए ५ मिनट भस्त्रिका, ५ मिनट कपालभाति और ५ मिनट अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें।
४. दिन भर में तीन-साढ़े तीन लीटर सादा पानी पियें। यानी हर सवा घंटे पर एक पाव। जितनी बार पानी पियेंगे उतनी बार पेशाब आयेगा। उसे रोकना नहीं है। पेशाब करते समय बिल्कुल ज़ोर न लगायें।
५. रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी से लें।
६. परहेज़- फ्रिज का ठंडा पानी, चिकनाई, चीनी तथा कफ कारक वस्तुएँ। अगर चाय छोड़ सकें तो बेहतर, नहीं तो उसके स्थान पर ग्रीन टी पियें। लेकिन उसमें चीनी न डालें।
इस कार्यक्रम का पालन करने से कैसी भी खाँसी हो केवल एक-दो सप्ताह में जड़ से समाप्त हो जायेगी।

— *डॉ विजय कुमार सिंघल*
मो. नं 9919997596

Saturday, October 12, 2019

How To Keep Your Body Healthy

*प्राकृतिक चिकित्सा - १ : स्वास्थ्य क्या है?*

स्वस्थ रहना सबसे बड़ा सुख है। कहावत भी है- ‘पहला सुख निरोगी काया’। कोई आदमी तभी अपने जीवन का पूरा आनन्द उठा सकता है, जब वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहे। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है, इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी शारीरिक स्वास्थ्य अनिवार्य है।

ऋषियों ने कहा है- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् यह शरीर ही धर्म का श्रेष्ठ साधन है। यदि हम धर्म में विश्वास रखते हैं और स्वयं को धार्मिक कहते हैं, तो अपने शरीर को स्वस्थ रखना हमारा पहला कर्तव्य है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, तो जीवन हमारे लिए भारस्वरूप हो जाता है।

एक विदेशी विद्वान् डा. बेनेडिक्ट जस्ट ने कहा है- ‘उत्तम स्वास्थ्य वह अनमोल रत्न है, जिसका मूल्य तब ज्ञात होता है, जब वह खो जाता है।’ एक शायर के शब्दों में- ‘कद्रे-सेहत मरीज से पूछो, तन्दुरुस्ती हजार नियामत है।’

प्रश्न उठता है कि स्वास्थ्य क्या है अर्थात् किस व्यक्ति को हम स्वस्थ कह सकते हैं? साधारण रूप से यह माना जाता है कि किसी प्रकार का शारीरिक और मानसिक रोग न होना ही स्वास्थ्य है। यह एक नकारात्मक परिभाषा है और सत्य के निकट भी है, परन्तु पूरी तरह सत्य नहीं। वास्तव में स्वास्थ्य का सीधा सम्बंध क्रियाशीलता से है। जो व्यक्ति शरीर और मन से पूरी तरह क्रियाशील है, उसे ही पूर्णतः स्वस्थ कहा जा सकता है। कोई रोग हो जाने पर क्रियाशीलता में कमी आती है, इसलिए स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है।

प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में स्वास्थ्य की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी गयी है। ऐलोपैथी और होम्योपैथी के चिकित्सक किसी भी प्रकार के रोग के अभाव को ही स्वास्थ्य मानते हैं। वे रोग को या उसके अभाव को तो माप सकते हैं, परन्तु स्वास्थ्य को मापने का उनके पास कोई पैमाना नहीं है। रोग के अभाव को मापने के लिए उन्होंने कुछ पैमाने बना रखे हैं, जैसे हृदय की धड़कन, रक्तचाप, लम्बाई या उम्र के अनुसार वजन, खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा आदि। इनमें से एक भी बात अनुभव द्वारा निर्धारित सीमाओं से कम या अधिक होने पर वे व्यक्ति को रोगी घोषित कर देते हैं और अपने ज्ञान के अनुसार उसकी चिकित्सा भी शुरू कर देते हैं।

इसके विपरीत आयुर्वेद में स्वास्थ्य की पूर्ण परिभाषा दी गयी है। आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में ऋषि ने लिखा है-
समदोषाः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते।।
अर्थात् जिसके तीनों दोष (वात, पित्त एवं कफ) समान हों, जठराग्नि सम (न अधिक तीव्र, न अति मन्द) हो, शरीर को धारण करने वाली सात धातुएँ (रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य) उचित अनुपात में हों, मल-मूत्र की क्रियाएँ भली प्रकार होती हों और दसों इन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा और उपस्थ), मन और इन सबका स्वामी आत्मा भी प्रसन्न हो, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।

*प्राकृतिक चिकित्सा - २ : स्वास्थ्य और जीवनीशक्ति*

मनुष्य के लिए स्वस्थ रहना कोई कठिन कार्य नहीं है। वास्तव में स्वस्थ रहना पूरी तरह स्वाभाविक है और अस्वस्थ रहना एकदम अस्वाभाविक है। कई लोगों को भ्रम रहता है कि सभी लोग बीमार पड़ते रहते हैं, हम भी पड़ गये तो कोई बड़ी बात नहीं है। इसलिए वे बीमार रहने और उसका इलाज चलते रहने को साधारण बात मानते हैं। वे अपनी आमदनी का एक बड़ा भाग डाक्टरों और दवाओं पर खर्च करना भी अनिवार्य मानते हैं। ऐसे लोग जानते ही नहीं कि स्वास्थ्य क्या होता है और लगातार दवाएँ खाते रहने पर भी (और वास्तव में उन्हीं के कारण ही) वे हमेशा बीमार बने रहते हैं तथा अन्त में उसी स्थिति में समय से पहले ही परलोक सिधार जाते हैं। वस्तुतः दवाइयाँ बीमारियों को दूर नहीं करतीं, बल्कि अधिकांश बीमारियों का कारण होती हैं।

वास्तव में स्वस्थ रहना बहुत ही आसान है और बीमार पड़ जाने पर स्वस्थ होना भी कठिन नहीं है। यदि हम खान-पान और रहन-सहन के साधारण नियमों का पालन करें, तो हमेशा स्वस्थ और क्रियाशील रहते हुए अपनी पूर्ण आयु भोग सकते हैं। एक बार महान् आयुर्वेदिक चिकित्सक चरक ने अपने शिष्यों से पूछा था- ‘कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?’ अर्थात् ”स्वस्थ कौन है? स्वस्थ कौन है? स्वस्थ कौन है?“ एक बुद्धिमान शिष्य ने इसका उत्तर इस प्रकार दिया था- ‘हित भुक्, ऋत् भुक्, मित भुक्’ अर्थात् ”हितकारी भोजन करने वाला, ऋतु अनुकूल और सात्विक उपायों से प्राप्त भोजन करने वाला तथा अल्प मात्रा में भोजन करने वाला ही स्वस्थ है।“

इस कहानी में स्वास्थ्य का पूरा रहस्य छिपा हुआ है। सन्तुलित मात्रा में सात्विक खान-पान करने वाला न केवल सदा स्वस्थ रहता है, बल्कि उसमें परिस्थितियों के अनुकूल ढलने और रोगों से लड़ने की शक्ति भी पर्याप्त मात्रा में होती है। इसी शक्ति को विद्वानों ने जीवनीशक्ति कहा है। जिस व्यक्ति में जितनी अधिक जीवनीशक्ति होती है, वह व्यक्ति उतना ही अधिक स्वस्थ और क्रियाशील रहता है और उसकी आयु भी अधिक होती है।

आजकल लोगों में जीवनीशक्ति का बहुत अभाव पाया जाता है। जरा सा मौसम बदलने पर ही वे बीमार पड़ जाते हैं और इसे स्वाभाविक बात मानकर मौसम को ही अपनी बीमारी का कारण बताकर दोष देते हैं। परन्तु मौसम तो सभी के लिए बदलता है। यदि यही बीमारियों का कारण होता, तो सभी लोग बीमार पड़ जाते। कई लोग पहले से ही डरे रहते हैं कि अब मौसम बदलने वाला है, तो बीमार पड़ना ही है। वास्तव में मौसम का बदलना नहीं, बल्कि जीवनीशक्ति की कमजोरी ही उनके बीमार पड़ने का प्रमुख कारण होती है।

जीवनीशक्ति कमजोर होने के कई कारण होते हैं। उनमें सबसे पहला है- अनुचित खान-पान और दूसरा है- मौसम के विपरीत चलना। हम स्वाद या चलन के वशीभूत होकर मनमानी चीजें खाते-पीते रहते हैं, जिनको हमारा शरीर स्वीकार नहीं कर पाता। उनको पचाने और उनका अधिकांश अनावश्यक भाग शरीर से बाहर निकालने में हमारी बहुत सी जीवनीशक्ति खर्च हो जाती है। इसी प्रकार हम जाड़ों में हीटर के सामने बैठे रहते हैं या गर्म कपड़ों से लदे रहते हैं, गर्मियों में कूलर और एयरकंडीशनर वाले कमरों में बैठे रहते हैं तथा बरसात में घर में घुसे रहते हैं। इससे हमारा शरीर मौसम के थोड़े से परिवर्तन को भी झेलने में असमर्थ हो जाता है।

स्वस्थ रहने और अपनी जीवनीशक्ति बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम मौसम के साथ-साथ चलें अर्थात् जहाँ तक हो सके जाड़ों में जाड़ा सहन करें, गर्मियों में गर्मी सहन करें और बरसात में भीगें। मौसम अपनी सहनशक्ति से बाहर होने पर ही हमें कृत्रिम उपायों का सहारा लेना चाहिए।



*प्राकृतिक चिकित्सा - ३*

*जीवन शैली और स्वास्थ्य*

इस लेख माला की पिछली कड़ी में हमने दो मुख्य बातें कही थीं- 
1. अस्वस्थ रहना अस्वाभाविक है, स्वस्थ रहना ही स्वाभाविक है। 
2. अस्वस्थ हो जाने पर सरलता से स्वस्थ हुआ जा सकता है। 

एक आदरणीय सज्जन ने इस दूसरे बिन्दु को स्पष्ट करने का आग्रह किया है। इस कड़ी में हम यही चर्चा करेंगे। 

इस बात पर प्रायः सभी चिकित्सक एकमत हैं कि हमारी जीवन शैली का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बंध है। उचित और सात्विक जीवन शैली से जहाँ उत्तम स्वास्थ्य बनता है और बीमारियाँ दूर रहती हैं, वहीं गलत जीवन शैली से स्वास्थ्य बिगड़ता है और अनेक प्रकार की बीमारियाँ घेर लेती हैं। वास्तव में आकस्मिक दुर्घटनाओं को छोड़कर लगभग सभी बीमारियाँ हमारी गलत जीवन शैली के कारण होती हैं और जीवन शैली में सुधार करके हम उन बीमारियों से पूर्णतः नहीं तो बहुत सीमा तक छुटकारा पा सकते हैं। पूर्णतः इसलिए नहीं कि कई बार गलत जीवन शैली से इतना स्थायी दुष्प्रभाव पड़ चुका होता है कि उसको पुनः पूर्व स्थिति में लाना लगभग असम्भव होता है। लेकिन ऐसे मामले बहुत कम होते हैं। अधिकांश बीमारियों को हम अपनी जीवन शैली में आवश्यक सुधार करके ठीक कर सकते हैं।

जीवन शैली से हमारा तात्पर्य अपने खान-पान, दिनचर्या, रहन-सहन, सामाजिक व्यवहार और कार्यप्रणाली से है। ये सभी तत्व जीवन शैली के अंग हैं और सभी महत्वपूर्ण हैं।

खान-पान जीवन शैली का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है। हम जो भी खाते-पीते हैं उसका हमारे स्वास्थ्य पर तत्काल और सीधा प्रभाव पड़ता है। इसलिए स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा खान-पान शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक हो। स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाला अन्न, मौसमी सब्जियाँ और फल, गाय का शुद्ध दूध और उनसे बनी स्वास्थ्यवर्धक वस्तुएँ सात्विक खान-पान माना जाता है। इसके विपरीत वस्तुएँ तथा अंडा, माँस, मद्य आदि सभी तामसी आहार हैं। सात्विक भोजन से ही तन और मन सात्विक बनता है और तामसी भोजन से तामसी बनता है। कहावत भी है- जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। जैसा पियोगे पानी, वैसी बनेगी वाणी।

हमारी दिनचर्या भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। समय पर सोना, जगना, नित्यक्रियायें करना और भोजन करना अच्छे स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं। जल्दी जगना और जल्दी सोना स्वास्थ्य के मूल सिद्धांत हैं। सुबह देर तक सोते रहने और रात्रि में देर तक जगे रहने का बुरा परिणाम देरी से ही सही हमें भुगतना ही पड़ता है। इसलिए अपवादों को छोड़कर हमें अपने निश्चित समय पर उठ जाना और सो जाना चाहिए। इन दोनों बातों के पालन के लिए यह भी आवश्यक है कि हम निर्धारित समय पर स्नान, जलपान, दोपहर का भोजन और सायंकाल का भोजन करें। इन बातों में मनमानी करने का दुष्परिणाम हमें ही भुगतना पड़ता है।

प्रायः लोग यहीं सबसे अधिक गलती करते हैं। सायंकालीन भोजन के समय वे चाय-नाश्ता करते हैं और फिर देर रात्रि में भोजन करते हैं और उसके तत्काल बाद सो जाते हैं। यह बहुत भयावह है। देर से भोजन करने के कारण उसे पचने का पर्याप्त समय और वातावरण नहीं मिलता। इससे वह बहुत देर से पचता है और फिर बहुत देर तक हमारे मलाशय में पड़े रहकर विकार उत्पन्न करता है। देर से सोने के कारण वे देर से ही जागते हैं, इससे उनको योग-व्यायाम आदि करने का समय भी नहीं मिलता और वे हमेशा अस्वस्थ होने का अनुभव करते हैं। देर से भोजन करने के कारण शरीर स्थूल हो जाना और पेट निकल आना साधारण बात है।

रहन-सहन के अन्तर्गत हमारा पहनावा, घर का वातावरण और आस-पड़ोस आते हैं। हमारा पहनावा मौसम के अनुकूल और समाज की परम्परा के अनुसार होना चाहिए। कहावत है कि ‘जैसा देश, वैसा वेश।’ घर का वातावरण भी स्वास्थ्य के अनुकूल और आनन्दप्रद होना चाहिए, ताकि बाहर से घर आकर हमें शान्ति के कुछ पल प्राप्त हो सकें। हमारा आस-पड़ोस भी अपने अनुकूल परिवारों और व्यक्तियों से पूर्ण होना चाहिए, जिनके बीच आपसी सामंजस्य हो, भले ही बहुत अधिक घनिष्टता न हो। जो व्यक्ति तनावपूर्ण वातावरण में रहते हैं, उनके स्वास्थ्य पर देर-सबेर बुरा प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। इसके अतिरिक्त हमें मौसम के साथ-साथ चलना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हम गर्मियों में गर्मी सहन करें, जाड़ों में जाड़ा सहन करें और बरसात में कभी-कभी भीगें भी। मौसम अपनी सहनशक्ति से बाहर होने पर ही हमें कूलर, एसी, हीटर आदि कृत्रिम उपायों का सहारा लेना चाहिए।

रहन-सहन के अन्तर्गत हमारे आवागमन के साधन भी आते हैं। बहुत से लोग पैदल चलने में लज्जा का अनुभव करते हैं और थोड़ी दूर सब्जी खरीदने जाने जैसे मामूली कार्यों के लिए भी कार, मोटरसाइकिल, स्कूटी आदि वाहनों का उपयोग करते हैं। एक-दो मंजिल चढ़ने के लिए सीढ़ियों की जगह लिफ्ट का प्रयोग करना भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो हमें वाहनों का उपयोग कम करना चाहिए और पैदल चलने तथा सीढ़ियों से चढ़ने उतरने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

हमारा सामाजिक व्यवहार भी स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हम समाज के एक अंग के रूप में उसके कार्यों में भाग लेते हैं, दूसरों के दुःख-सुख में उचित व्यवहार करते हैं, परिचितों से मेल-जोल रखते हैं, तो हमारे मन में एक प्रकार की प्रसन्नता और संतुष्टि का निर्माण होता है, जिसका सुपरिणाम हमें अच्छे स्वास्थ्य के रूप में प्राप्त होता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो, हमें अपनी शक्ति के अनुसार सामाजिक कार्यों में तन-मन-धन से अवश्य भाग लेना चाहिए।

स्पष्ट है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि सामान्य रूप से स्वस्थ रहने के लिए भी अपनी जीवन शैली को सही रखना चाहिए। गलत जीवन शैली का दुष्प्रभाव स्वास्थ्य पर अवश्य पड़ता है। जिन व्यक्तियों की जीवन शैली गलत होती है, भले ही वे जवानी में स्वास्थ्य पर उसके बुरे प्रभावों का अनुभव न कर पायें, लेकिन जैसे ही उनकी उम्र 40-45 के आसपास पहुँचती है, वैसे ही उनके स्वास्थ्य में अनेक समस्यायें दिखायी पड़ने लगती हैं। रक्तचाप कम या अधिक हो जाना, शुगर की शिकायत हो जाना या मूत्र सम्बंधी रोग हो जाना तो उनके लिए सामान्य बात है। इन रोगों को कोई दवा दूर नहीं कर सकती चाहे आप जीवन भर दवाइयाँ लेते रहें। लेकिन अपनी जीवन शैली में सुधार करके बहुत सरलता से इन रोगों से छुटकारा पा सकते हैं।

*प्राकृतिक चिकित्सा - ४*

*स्वास्थ्य पर दवाओं का कुप्रभाव*

बचपन से ही लोगों के मन में यह बात बैठ जाती है कि यदि कोई व्यक्ति बीमार है या उसे स्वास्थ्य सम्बंधी मामूली सी भी शिकायत है, तो वह दवा के बिना ठीक ही नहीं होगा। इसलिए अस्वस्थ होते ही वे किसी न किसी दवा की तलाश करते हैं या डाक्टरों-वैद्यों के पास भागते हैं। वे यह जानने की कोशिश नहीं करते कि वह बीमारी या शिकायत क्यों पैदा हुई अर्थात् उसका कारण क्या है। यदि वे इसका पता लगा लें, तो वह कारण दूर कर देने पर अस्वस्थता भी दूर हो सकती है। परन्तु लोग इतना सोचने का कष्ट नहीं करते और प्रायः मौसम या किसी अज्ञात वस्तु को अपनी बीमारी का कारण मान लेते हैं और विश्वास करते हैं कि शीघ्र ही कोई दवा खा लेने पर वे स्वस्थ हो जायेंगे। वे बीमार पड़ने और उसके लिए दवा खाने को इतनी स्वाभाविक बात समझते हैं कि दवा के बिना स्वस्थ होने की बात उन्हें अस्वाभाविक और अविश्वसनीय लगती है।

यदि घर में कोई बड़ा-बूढ़ा होता है, तो वह घरेलू चीजों से बने नुस्खे से उनकी बीमारी दूर करने की कोशिश करता है और आश्चर्य नहीं कि कई बार ये नुस्खे सफल भी हो जाते हैं। इसका कारण यह हो सकता है कि ये नुस्खे मूलतः आयुर्वेद की बुनियाद पर बने होते हैं। लेकिन अधिकतर ये भी असफल हो जाते हैं, क्योंकि ये बीमारी के मूल कारण को ध्यान में रखे बिना ही आजमाये जाते हैं। आयुर्वेद का प्रसार कम हो जाने के कारण उसका ज्ञान भी सीमित हो गया है और अधिकांश लोग केवल सुने-सुनाए नुस्खों को ही आजमाते हैं।

एक दवा असफल हो जाने पर लोग उससे बेहतर दवा की तलाश करते हैं। यह तलाश प्रायः अंग्रेजी दवाओं पर जाकर समाप्त होती है। कई बार वे स्वयं उन्हें खरीद लाते हैं और कभी-कभी डाक्टरों के पास जाकर लिखवा लाते हैं। वे सोचते हैं कि ये दवाएँ बहुत पढ़े-लिखे डाक्टर ने लिखी हैं, योग्य लोगों द्वारा बड़े-बड़े कारखानों में बनायी गयी हैं, नाम भी अंग्रेजी में हैं और महँगी भी हैं, इसलिए अवश्य ही इनमें कुछ गुण होगा। इसलिए वे पूरी निष्ठा और विश्वास से उनका सेवन करते हैं। अधिकांश में उन्हें प्रारम्भिक लाभ भी हो जाता है, जिससे वे डाक्टरों और उनकी दवाओं के प्रशंसक बन जाते हैं।

परन्तु कुछ दिन रोग दबे रहने पर वह फिर से उभरता है, क्योंकि ये दवाएँ किसी रोग के कारण को दूर नहीं करतीं, बल्कि केवल उसके लक्षणों को कम कर देती हैं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि किसी व्यक्ति को सिरदर्द है। आयुर्वेद की दृष्टि से इसके 175 कारण हो सकते हैं। लेकिन रोगी दर्द के कारण की चिन्ता किए बिना केवल उससे तत्काल मुक्ति पाने से लिए दर्दनाशक दवा की शरण में चला जाता है और कुछ समय के लिए उससे मुक्त भी हो जाता है। दर्दनाशक दवाएँ दर्द के कारण को दूर करने की दृष्टि से नहीं, बल्कि दर्द का अनुभव न हो इस दृष्टि से बनायी गयी होती हैं। दूसरे शब्दों में, वे हमारे नाड़ी तंत्र के उन तंतुओं को निष्क्रिय कर देती हैं, जो दर्द की सूचना हमारे मस्तिष्क को देते हैं। इससे हमें दर्द का पता ही नहीं चलता और हम समझते हैं कि दर्द चला गया। परन्तु वास्तव में दर्द जाता ही नहीं, क्योंकि उसका जो मूल कारण है वह दूर नहीं हुआ होता।

सिरदर्द ही नहीं वरन् सभी प्रकार के रोगों में यही अनुभव होता है। उल्टी आ रही है, तो दवा से उसे रोक देते हैं। दस्त आ रहे हैं, तो दस्तों को रोक देते हैं। जुकाम हो गया है, तो कफ का निकलना रोक देते हैं। इससे रोग के मूल कारण शरीर में ही बने रहते हैं और अन्दर ही अन्दर प्रबल होते रहते हैं। रोग के वे लक्षण किसी दिन फिर जोर से उभर आते हैं अर्थात् रोग वापस आ जाता है और पहले से अधिक जोर से आता है। ऐसा होते ही मरीज फिर डाक्टरों की शरण में जाता है और इस बार डाक्टर कोई अधिक तेज दवा लिख देते हैं। कई बार उनसे फिर आराम मिल जाता है।

बहुत बार ऐसा भी होता है कि रोग किसी नये रूप में बाहर आता है और डाक्टर उसी के अनुसार दवाओं की संख्या और मात्रा बढ़ा देते हैं। ये दवाएँ फिर किसी अन्य रोग को पैदा कर देती हैं। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, वैसे-वैसे दवाएँ भी बढ़ती हैं और जैसे-जैसे दवाएँ बढ़ती हैं, वैसे-वैसे रोग भी बढ़ता जाता है। इस प्रकार रोग और दवाएँ साथ-साथ बढ़ते चले जाते हैं और रोगी हमेशा के लिए उनके चंगुल में फँस जाता है। ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’ यह कहावत ऐसे ही अनुभवों से बनी है।

अंग्रेजी दवाओं के पार्श्व प्रभाव (साइड इफैक्ट) से सभी परिचित हैं। दवाओं की शीशियों और डिब्बों पर अनिवार्य रूप से यह लिखा होता है कि इस दवा के क्या-क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं। सभी ऐलोपैथिक दवाएँ रासायनिक पदार्थों से बनी होती हैं। हमारा शरीर उन्हें स्वीकार करने को राजी नहीं होता, इसलिए उन्हें बाहर निकालने में जुट जाता है। यही कारण है कि ऐलोपैथिक दवाएँ खाने वाले व्यक्ति के मल-मूत्र का रंग तुरन्त बदल जाता है और उनमें बहुत बदबू भी आती है। रोगी के शरीर की बहुत सी शक्ति इन दवाओं से लड़ने और बाहर निकालने में खर्च हो जाती है, जिसके कारण उसकी जीवनीशक्ति कम हो जाती है। इससे शरीर रोगों से लड़ने में अक्षम हो जाता है और नये-नये रोगों का घर बन जाता है।

*प्राकृतिक चिकित्सा - ५*

*ऐलोपैथी प्रणाली का मकड़जाल*

वर्तमान में पूरे संसार में जिस चिकित्सा प्रणाली का वर्चस्व या बोलबाला है वह है ऐलोपैथी। लगभग 99% डॉक्टर और अस्पताल इसी प्रणाली के हैं। बडे बडे चिकित्सा महाविद्यालय केवल इसी की शिक्षा देते हैं जिनमें से हर साल लाखों की संख्या में नये डॉक्टर बनकर निकलते हैं और उन पर सरकारें अरबों-खरबों रुपये व्यय करती हैं। इनकी तुलना में अन्य पद्धतियों के चिकित्सक बहुत कम संख्या में हैं और उनके अस्पताल तो उँगलियों पर गिने जाने लायक ही हैं। सरकारें भी इन पर नाममात्र का खर्च करती हैं।

ऐलोपैथी की व्यापकता का कारण यह नहीं है कि यह रोगों के इलाज में अन्य पद्धतियों की तुलना में अधिक सफल है या रोगों को जड़ से ठीक करती है। इसका कारण केवल इतना है कि इसमें मरीज़ को स्वयं कुछ नहीं करना पड़ता, सारे काम डॉक्टर और नर्स करते हैं। मरीज़ को केवल गोलियाँ गटककर पड़े रहना पड़ता है। जबकि अन्य चिकित्सा पद्धतियों जैसे आयुर्वेद और प्राकृतिक में मरीजों को परहेज वाले भोजन के साथ टहलने, व्यायाम करने, योग-प्राणायाम करने और अन्य क्रियायें करने के लिए भी कहा जा सकता है।

यही कारण है कि जैसे ही कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है या उसके साथ कोई दुर्घटना होती है, तो उसके परिवारी सबसे पहले ऐलोपैथी या अंग्रेज़ी डॉक्टर या अस्पताल की ओर ही भागते हैं और रोगी को उनके हवाले कर देते हैं।

इन डॉक्टरों या अस्पतालों में जाने पर भी कोई रोग या रोगी ठीक नहीं होता। क्योंकि तरह-तरह की महँगी जाँचों के बावजूद कई बार तो उन्हें यही पता नहीं होता कि रोगी को क्या बीमारी है। बस यों ही अनुमान के आधार पर अँधेरे में तीर मारते रहते हैं और दवाइयाँ खिलाते रहते हैं, जिनसे रोग और अधिक बिगड़ जाता है।

कई अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि डाक्टरों और अस्पतालों की बढ़ती हुई संख्या से रोगों या रोगियों की संख्या में कोई कमी नहीं आती। वास्तव में ये रोगों को कम करने का नहीं बल्कि फैलाने का काम करते हैं और देश की आबादी घटाने में अपना योगदान देते हैं। एक बार इस्रायल में सभी सरकारी और प्राइवेट डाक्टरों और अस्पतालों ने हड़ताल कर दी थी। यह हड़ताल तीन महीने तक चली थी। सारे समाजशास्त्री यह देखकर दंग रह गये कि उन तीन महीनों में इस्रायल में मृत्यु-दर एकदम नीचे आ गयी थी। तीन माह बाद जब हड़ताल समाप्त हुई तो मृत्यु-दर फिर पहले जितनी हो गयी। ऐसे ही अनुभव और भी कई देशों में हुए हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि अभी तक न तो सरकार की ओर से और न डॉक्टरों के संगठनों की ओर से विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों का कोई तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। ऐसे अध्ययन के अभाव में कोई नहीं कह सकता कि किन रोगों में किन परिस्थितियों में कौन सी चिकित्सा प्रणाली कितनी उपयोगी या व्यर्थ है। बस भेडचाल की तरह लोग अंग्रेज़ी दवाओं और डॉक्टरों की ओर भागते हैं तथा अपने स्वास्थ्य, धन और जीवन का नाश कर रहे हैं।

मेरे विचार से ऐलोपैथी की उपयोगिता केवल दुर्घटनाओं के समय होती है। हाथ-पैरों की हड्डियाँ टूट जाने पर या कहीं गम्भीर चोट लग जाने पर वे तत्काल मरहम-पट्टी कर सकते हैं और खून का बहना रोक सकते हैं। प्लास्टर आदि चढ़ा देने से मरीज को थोड़ी राहत मिलती है, क्योंकि इससे हड्डियाँ सही जगह बैठ जाती हैं। हालांकि हड्डियों का फिर से जुड़ना पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसमें कोई दवा कोई काम नहीं करती। साधारण भोजन, दूध आदि लेते रहने से ही कुछ ही समय में हड्डियाँ अपने आप जुड़ जाती हैं।

डॉ एस.एस.एल. श्रीवास्तव मेरठ मेडीकल कालेज के मेडीसिन विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने एक पुस्तक लिखी है- ‘चिकित्सा विज्ञान की भ्रांतियाँ’। इस पुस्तक में उन्होंने आधुनिक अर्थात् ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान की तमाम मान्यताओं और दावों की जमकर बखिया उधेड़ी है। यह पुस्तक सभी डाक्टरों को अवश्य पढ़नी चाहिए।

ऐलोपैथी की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह शल्य चिकित्सा पर जरूरत से ज्यादा जोर देती है। यदि शरीर का कोई अंग किसी कारणवश काम करना बन्द कर देता है या विकृत हो जाता है, तो वे उसको फिर से काम करने लायक बनाने का प्रयास कम करते हैं। ज्यादातर वे उसे काटकर शरीर से अलग कर देते हैं और कई बार उसके स्थान पर उधार लिया हुआ अंग लगा देते हैं। ऐसे अंग तमाम प्रयास करने पर भी स्वाभाविक रूप से काम नहीं कर पाते और वह व्यक्ति हमेशा अर्थात् अपने जीवनभर रोगी बना रहता है।

अब समय आ गया है कि प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली और स्वास्थ्यप्रद जीवनशैली का अधिक से अधिक प्रचार करके सामान्य जनता को ऐलोपैथी के मकड़जाल से मुक्त किया जाये और देशवासियों का अमूल्य जीवन बचाया जाये।

*प्राकृतिक चिकित्सा - ६*

*रोग क्यों होते हैं?*

रोगों से बचने और उन्हें दूर करने के उपाय जानने से पहले यह समझना आवश्यक है कि रोग होने का कारण क्या है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कीटाणुओं को विभिन्न रोगों का कारण मानता है और रोगों को समाप्त करने के लिए कीटाणुओं को समाप्त करना आवश्यक समझता है। यह कीटाणु सिद्धान्त ही ऐलोपैथी चिकित्सा प्रणाली की नींव है। यह नींव बहुत कमजोर है। कई बार सरकारें किसी रोग विशेष के कीटाणुओं को समाप्त करने के लिए बड़े जोर-शोर से अभियान चलाती हैं। चेचक, मलेरिया आदि रोगों को समाप्त करने के लिए ऐसे अभियान वर्षों तक चलाये गये हैं। परन्तु कीटाणु पूरी तरह समाप्त करने पर भी ये रोग समाप्त नहीं हुए और कभी भी किसी को भी हो जाते हैं।
पल्स पोलियो टीकाकरण अभियान भी इसी कीटाणु सिद्धान्त पर आधारित है। यह अभियान प्रारम्भ करते समय दावा किया गया था कि पाँच-छः वर्षों में पोलियो जड़ से समाप्त हो जाएगा। लेकिन यह अभियान चलते हुए २५ वर्ष से अधिक समय हो जाने और अरबों रुपये खर्च करने पर भी पोलियो समाप्त नहीं हो रहा है। कई ऐसे उदाहरण भी सामने आये हैं कि किसी बच्चे को पाँच-पाँच बार पोलियो ड्राॅप पिलाये जाने के बाद भी पोलियो हो गया, जबकि पहले वह स्वस्थ था। किसी डाक्टर या विशेषज्ञ के पास इसका उत्तर नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ। ऐसे मामलों से कीटाणु सिद्धान्त की निरर्थकता ही सिद्ध होती है।

प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान का मानना है कि कीटाणु किसी रोग के कारण नहीं, बल्कि लक्षण होते हैं। दूसरे शब्दों में, कीटाणुओं से कोई रोग नहीं होता, बल्कि रोग से ही वे कीटाणु पैदा होते हैं। कीटाणुओं को समाप्त करके आप उस रोग के लक्षणों को कुछ समय के लिए समाप्त कर सकते हैं, परन्तु वह रोग समाप्त नहीं हो सकता। यदि शरीर में रोगों से लड़ने की पर्याप्त शक्ति है, जिसे हम जीवनी शक्ति कहते हैं, तो किसी भी रोग के कीटाणु हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। यह तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि सभी प्रकार के कीटाणु हानिकारक नहीं होते, बल्कि बहुत से तो रोगों से बचने में हमारी सहायता करते हैं। हमारे खून में ही लाल और श्वेत दो प्रकार के रक्तकण होते हैं। इनमें से लाल रक्तकण रोगों से मुकाबला करने में हमारी सहायता करते हैं। जब बाहर से किसी रोग के कीटाणु प्रवेश करते हैं, तो शरीर को स्वस्थ रखने वाले रक्तकण उनको मार भगाते हैं या समाप्त कर देते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान की मान्यता है कि रोगों का मूल कारण हमारे शरीर में रहने वाले विकार या विजातीय द्रव्य होते हैं। रोगों के कीटाणुओं को इन विजातीय द्रव्यों में पलने और बढ़ने का अवसर मिलता है। यदि शरीर में विजातीय द्रव्य न हों, तो किसी रोग के कीटाणु शरीर में आते ही मर जायेंगे और शरीर स्वस्थ बना रहेगा।

हमारा शरीर विजातीय द्रव्यों या विकारों को निरन्तर निकालता रहता है। शरीर से मल निष्कासन के कई मार्ग या अंग होते हैं, जैसे गुदा, मूत्रांग, त्वचा, नाक और कान। इन मार्गों से शरीर में बनने वाला विभिन्न प्रकार का मल लगातार निकलता रहता है। यदि ये अंग अपना कार्य सुचारु रूप से करते रहते हैं, तो शरीर स्वस्थ बना रहता है। यदि इनके कार्य में कोई रुकावट आती है, तो शरीर में विकार इकट्ठे होने लगते हैं। जब ये विकार बहुत बढ़ जाते हैं, तो शरीर उन्हें तेजी से निकालने लगता है। इसी को हम रोग कहते हैं। उदाहरण के लिए, शरीर में कफ अधिक एकत्र हो जाने पर प्रकृति उसे नाक और गले के रास्ते तेजी से निकालने लगती है, जिसको हम खाँसी या जुकाम कहकर पुकारते हैं।

इस प्रकार आये दिन होने वाले जुकाम, खाँसी, उल्टी, दस्त, बुखार, पेटदर्द, सिरदर्द आदि शरीर में एकत्र हो गये विकारों के सूचक और उन्हें निकालने के माध्यम हैं। यह हमारे ऊपर प्रकृति माता की बड़ी कृपा है कि वह हमें स्वस्थ करने का प्रयास स्वयं करती रहती है, परन्तु यह हमारा अज्ञान है कि हम शरीर को स्वस्थ करने के इन प्राकृतिक प्रयासों को रोग समझ लेते हैं और दवाओं द्वारा उन प्रयासों में रुकावट डालते हैं। यदि हम विकारों को अपने आप निकलने दें, तो वे रोग अपना कार्य करके स्वयं ही चले जाते हैं।

वास्तव में ऐलोपैथी के पास इसका कोई उत्तर नहीं है कि रोग क्यों होते हैं। वे कीटाणुओं को ही उनका कारण बताते हैं। इसमें उनके पास कोई तर्क नहीं होता, बल्कि दुराग्रह ही होता है। उदाहरण के लिए, कोई डाक्टर यह नहीं बता पाता कि बुखार क्यों आता है। वे गर्मी और सर्दी दोनों मौसमों को बुखार का कारण बताते हैं और यदि ऐसा कोई कारण समझ में नहीं आता, तो उसे वायरल फीवर कह देते हैं। इसी तरह उन्हें किसी भी रोग का कारण समझ में न आने पर उसे इन्फैक्शन बता देते हैं। उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं होता कि बुखार में शरीर का तापमान क्यों बढ़ जाता है। यदि बुखार सर्दी से आया है, तो शरीर क्यों गर्म होता है, उन्हें इसका कोई कारण मालूम नहीं।

प्राकृतिक चिकित्सा का मानना है कि बुखार कोई रोग नहीं है, बल्कि शरीर में एकत्र हो गये विकारों को जलाने का प्रकृति का एक प्रयास है। इसे यों समझिए कि शरीर में एकत्र विकार एक प्रकार का ज्वलनशील पदार्थ या ईंधन है। जब वह विकार शरीर की सहनशक्ति से बाहर हो जाता है, तो शरीर उसे जलाने लगता है। इससे शरीर का तापमान बढ़ जाता है, जिसे हम बुखार कहते हैं। यदि हम प्रकृति के इस कार्य में हस्तक्षेप न करें और विकारों को जलने दें, तो सारे विकार जल जाने पर बुखार अपने आप ठीक हो जाता है और शरीर पहले से अधिक स्वस्थ हो जाता है। इस प्रकार बुखार कोई रोग नहीं है, बल्कि एक प्रकार की दवा है, जो हमें स्वस्थ कर देती है।

बुखार आना इस बात का सूचक है कि प्रकृति की रोग निवारक शक्तियाँ अभी भी हमारे शरीर में सक्रिय हैं। दूसरे शब्दों में, बुखार रोगी में जीवनीशक्ति बची रहने का सबूत है अर्थात् रोगी स्वस्थ हो सकता है। इसीलिए एक प्राकृतिक चिकित्सक कहा करते थे- ‘तुम मुझे बुखार दो, मैं तुम्हें आरोग्य दूँगा।’ इसलिए यदि हम बुखार को जबर्दस्ती दबायेंगे, तो अगली बार वह और अधिक तेज होकर निकलेगा या किसी अन्य बड़े रोग के रूप में निकलेगा। इसके साथ ही रोगी की जीवनीशक्ति कमजोर हो जाएगी। इससे आगे चलकर रोगी को कई रोग हो सकते हैं।


प्राकृतिक चिकित्सा - ७

ऐलोपैथी पर निर्भरता की विवशता

इस लेखमाला की पिछली दो तीन कड़ियों में हमने ऐलोपैथी चिकित्सा प्रणाली की चर्चा की है। इसकी दवाओं के बुरे प्रभाव और रोगों को ठीक करने में असफलताओं के बड़े प्रतिशत के बावजूद अधिकांश रोगी ऐलोपैथी की शरण में जाने को बाध्य होते हैं। इसके कई कारण हैं।

पहला कारण है भेड़चाल! लोग पुरानी और सस्ती आयुर्वेदिक या होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति या बिना दवा की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से उपचार कराना पिछड़ापन समझते हैं और महँगी ऐलोपैथी से इलाज कराने में अपनी शान मानते हैं। भले ही रोगी ठीक न हो, पर इसका दोष वे अपनी मूर्खता को देने की जगह रोगी के भाग्य को देते हैं।

दूसरा कारण है विकल्पहीनता। आजकल अच्छे वैद्यों की बहुत कमी है जो केवल नाड़ी देखकर रोग को पहचान लें और उसकी सही चिकित्सा कर सकें। यही हाल  होम्योपैथिक और प्राकृतिक चिकित्सकों का है। इनकी तुलना में ऐलोपैथिक डॉक्टर अधिक आसानी से सब जगह उपलब्ध हो जाते हैं। इसलिए लोग परिणाम और खर्च की चिन्ता किये बिना उनके पास ही जाते हैं।

विशेष रूप से आकस्मिक दुर्घटनाओं के समय तो ऐलोपैथिक अस्पतालों में जाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। यद्यपि शल्य चिकित्सा मूलत: आयुर्वेद की देन है, लेकिन आजकल के आयुर्वेदिक चिकित्सकों को इसका कोई ज्ञान नहीं है और न आयुर्वेद महाविद्यालयों में इसकी शिक्षा दी जाती है। इसलिए किसी दुर्घटना की स्थिति में या गम्भीर बीमारी में ऐलोपैथिक अस्पतालों में जाना सबकी मजबूरी है।

ऐलोपैथी पर निर्भरता का तीसरा कारण यह है कि उसके पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी विभागों में रोगों की जाँच की ऐसी सुविधायें उपलब्ध हैं जो अन्य चिकित्सा पद्धतियों में कहीं नहीं हैं। प्राचीन काल के वैद्यों को ऐसे परीक्षणों की आवश्यकता कभी नहीं पडती थी, क्योंकि वे रोगी की नाड़ी, जीभ, आँखें और मूत्र को देखकर ही रोग और उसके कारणों का पता लगा लेते थे। लेकिन अब ऐसे वैद्य लगभग समाप्त हो गये हैं। परिणाम स्वरूप ऐसे परीक्षणों पर ऐलोपैथी का एकाधिकार हो गया है।

अाजकल रोगी के रक्त, मूत्र, मल, हृदय आदि की जाँच करके ही उसके रोग को पहचानने की कोशिश की जाती है और ऐसी जाँच प्राय: हर रोगी को करानी ही पड़ती हैं। अधिकांश आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चिकित्सक भी ऐसी जाँच रिपोर्टों पर निर्भर करते हैं, क्योंकि रक्त और मूत्र के परीक्षण से तत्काल यह जाना जा सकता है कि रोगी के शरीर में किस तत्व की कमी या अधिकता है। ऐसी खराबी का पता चलने पर ऐलोपैथिक चिकित्सक जहाँ दवाइयाँ लिख देते हैं, वहीं अनुभवी प्राकृतिक चिकित्सक भोजन में किसी वस्तु की मात्रा घटा या बढ़ाकर ही उस खराबी को दूर कर लेते हैं।

हालाँकि यह भी सत्य है कि ये जाँच रिपोर्ट ही रोगी के ठीक होने या उसके रोग को ठीक ठीक समझने की गारंटी नहीं हैं। यह देखा गया है कि अनेक जाँचों के बाद भी कई बार रोग का सही कारण पकड़ में नहीं आता और डॉक्टर अधूरी जानकारी या अनुमान के आधार पर ही चिकित्सा करते रहते हैं जो अधिकतर असफल रहती है।

अधिक समय नहीं गुज़रा जब एंटीबायोटिक दवाओं को रोगियों के लिए वरदान माना गया था और यह दावा किया गया था कि इनसे बडे बडे रोगों को सरलता से दूर किया जा सकता है। लेकिन अनुभव से सिद्ध हो गया कि एंटीबायोटिक दवायें रोगी के शरीर को भीतर से खोखला कर देती हैं, जिससे वह रोगों का सामना करने में असमर्थ हो जाता है। दूसरे शब्दों में, उसकी जीवनशक्ति बहुत कमजोर हो जाती है।

आजकल दर्दनाशक दवाओं (पेनकिलर) के लिए भी ऐलोपैथी की बहुत प्रशंसा की जाती है और दावा किया जाता है कि वे किसी भी प्रकार के दर्द से तत्काल आराम दिला देती हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि दर्दनाशक दवाएं रोगी की नाड़ियों को इस तरह निष्क्रिय कर देती हैं कि वे दर्द की सूचना हमारे मस्तिष्क को देने में असमर्थ हो जाती हैं। दर्द के वास्तविक कारण को दूर करने में ये दवाएँ पूरी तरह असफल रहती हैं।

यह भी देखा गया है कि बार बार दर्दनाशक दवायें लेने से रोगी का नाड़ी तंत्र बुरीतरह क्षतिग्रस्त हो जाता है और उसके कारण अनेक नये रोग पैदा हो जाते हैं। लेकिन पीड़ित रोगी अपने अज्ञान के कारण इनका सेवन करते रहते हैं और हानि उठाते हैं।

इसलिए सबसे अच्छा यही है कि हम कभी दवाओं के चक्कर में न पड़ें और सात्विक खान-पान तथा संतुलित जीवनशैली अपनाकर सदा स्वस्थ रहें। यदि दैवयोग से कभी बीमार पड़ भी जायें तो प्राकृतिक उपचार अपनाकर सरलता से उस बीमारी को जड़ से मिटाया जा सकता है।

— डॉ विजय कुमार सिंघल
प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य
मो. 9919997596

Sunday, September 22, 2019

Thoughts Are More Powerful, You Become What You Think

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In the movie "Taare Zameen Par", the art teacher tells the rude & cursing father of the dyslexic kid about "Solomon Islands", where the tribals don’t cuf down a tree. *They surround the tree & curse it for hours every day.* Within a few weeks, the tree
dries up & dies.

Difficult to believe?  How can intangible, invisible thoughts & words kill a tree?

If you read Bruce H. Lipton’s THE BIOLOGY OF BELIEF, you will think a dozen times before saying something demoralizing to yourself or to the people you love.

In this book, Mr. Lipton details the power of conscious & subconscious mind.

The subconscious mind is million times more powerful than the conscious mind & decides most of the things in our lives according to the beliefs it has.

Many times we fail to change an unpleasant habit despite our will-power & conscious efforts. It is because the habit gets so strongly programmed in our subconscious mind that the efforts made by our conscious mind hardly make any difference.

*Conscious Mind is just a shadow* *of our Unconscious Mind..*

So, when the tribals of Solomon Islands curse a tree, they are actually installing negative & harmful beliefs in the tree’s emotion (yes, trees have emotions).

Within few days, those negative emotions becomes a belief & eventually changes the molecular architecture of the tree & kill it from inside..

2500 years ago, when Buddha said *‘You are what you think',* actually he was telling a scientific fact which is now proved correct by Quantum Physics & Molecular Biology.

The book has a special chapter on Conscious Parenting where it talks about the beneficial & harmful effects of what parents say to their children..

*If you are a parent and you keep cursing your child in the name of constructive criticism, you are installing beliefs in their mind which will keep harming them forever..*

But if you keep appreciating them sincerely, you are installing beliefs in their mind which will help them in their entire life..*

Also be careful of what you keep saying to yourself.

Repetition of words & thoughts is the best way to install a belief in your subconscious mind.

If you keep saying you are a loser, don’t be surprised if you become a loser within a few months or years.

If your friends keep saying such things to you, there is no harm in saying a quick goodbye to them.

May be you value their friendship a lot. But you must value yourself more than such friendship.

Accept all people as they are. Love all people unconditionally ( later Hinduism adapted it as vasudeva kutumbakam).

Always keep saying to yourself
*I am healthy, wealthy, happy, successful & prosperous!*

Be positive..

Monday, September 16, 2019

जीवन शैली और स्वास्थ्य

*प्राकृतिक चिकित्सा - ३*

*जीवन शैली और स्वास्थ्य*

इस लेख माला की पिछली कड़ी में हमने दो मुख्य बातें कही थीं-
1. अस्वस्थ रहना अस्वाभाविक है, स्वस्थ रहना ही स्वाभाविक है।
2. अस्वस्थ हो जाने पर सरलता से स्वस्थ हुआ जा सकता है।

एक आदरणीय सज्जन ने इस दूसरे बिन्दु को स्पष्ट करने का आग्रह किया है। इस कड़ी में हम यही चर्चा करेंगे।

इस बात पर प्रायः सभी चिकित्सक एकमत हैं कि हमारी जीवन शैली का हमारे स्वास्थ्य से सीधा सम्बंध है। उचित और सात्विक जीवन शैली से जहाँ उत्तम स्वास्थ्य बनता है और बीमारियाँ दूर रहती हैं, वहीं गलत जीवन शैली से स्वास्थ्य बिगड़ता है और अनेक प्रकार की बीमारियाँ घेर लेती हैं। वास्तव में आकस्मिक दुर्घटनाओं को छोड़कर लगभग सभी बीमारियाँ हमारी गलत जीवन शैली के कारण होती हैं और जीवन शैली में सुधार करके हम उन बीमारियों से पूर्णतः नहीं तो बहुत सीमा तक छुटकारा पा सकते हैं। पूर्णतः इसलिए नहीं कि कई बार गलत जीवन शैली से इतना स्थायी दुष्प्रभाव पड़ चुका होता है कि उसको पुनः पूर्व स्थिति में लाना लगभग असम्भव होता है। लेकिन ऐसे मामले बहुत कम होते हैं। अधिकांश बीमारियों को हम अपनी जीवन शैली में आवश्यक सुधार करके ठीक कर सकते हैं।

जीवन शैली से हमारा तात्पर्य अपने खान-पान, दिनचर्या, रहन-सहन, सामाजिक व्यवहार और कार्यप्रणाली से है। ये सभी तत्व जीवन शैली के अंग हैं और सभी महत्वपूर्ण हैं।

खान-पान जीवन शैली का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है। हम जो भी खाते-पीते हैं उसका हमारे स्वास्थ्य पर तत्काल और सीधा प्रभाव पड़ता है। इसलिए स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा खान-पान शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक हो। स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाला अन्न, मौसमी सब्जियाँ और फल, गाय का शुद्ध दूध और उनसे बनी स्वास्थ्यवर्धक वस्तुएँ सात्विक खान-पान माना जाता है। इसके विपरीत वस्तुएँ तथा अंडा, माँस, मद्य आदि सभी तामसी आहार हैं। सात्विक भोजन से ही तन और मन सात्विक बनता है और तामसी भोजन से तामसी बनता है। कहावत भी है- जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। जैसा पियोगे पानी, वैसी बनेगी वाणी।

हमारी दिनचर्या भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। समय पर सोना, जगना, नित्यक्रियायें करना और भोजन करना अच्छे स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं। जल्दी जगना और जल्दी सोना स्वास्थ्य के मूल सिद्धांत हैं। सुबह देर तक सोते रहने और रात्रि में देर तक जगे रहने का बुरा परिणाम देरी से ही सही हमें भुगतना ही पड़ता है। इसलिए अपवादों को छोड़कर हमें अपने निश्चित समय पर उठ जाना और सो जाना चाहिए। इन दोनों बातों के पालन के लिए यह भी आवश्यक है कि हम निर्धारित समय पर स्नान, जलपान, दोपहर का भोजन और सायंकाल का भोजन करें। इन बातों में मनमानी करने का दुष्परिणाम हमें ही भुगतना पड़ता है।

प्रायः लोग यहीं सबसे अधिक गलती करते हैं। सायंकालीन भोजन के समय वे चाय-नाश्ता करते हैं और फिर देर रात्रि में भोजन करते हैं और उसके तत्काल बाद सो जाते हैं। यह बहुत भयावह है। देर से भोजन करने के कारण उसे पचने का पर्याप्त समय और वातावरण नहीं मिलता। इससे वह बहुत देर से पचता है और फिर बहुत देर तक हमारे मलाशय में पड़े रहकर विकार उत्पन्न करता है। देर से सोने के कारण वे देर से ही जागते हैं, इससे उनको योग-व्यायाम आदि करने का समय भी नहीं मिलता और वे हमेशा अस्वस्थ होने का अनुभव करते हैं। देर से भोजन करने के कारण शरीर स्थूल हो जाना और पेट निकल आना साधारण बात है।

रहन-सहन के अन्तर्गत हमारा पहनावा, घर का वातावरण और आस-पड़ोस आते हैं। हमारा पहनावा मौसम के अनुकूल और समाज की परम्परा के अनुसार होना चाहिए। कहावत है कि ‘जैसा देश, वैसा वेश।’ घर का वातावरण भी स्वास्थ्य के अनुकूल और आनन्दप्रद होना चाहिए, ताकि बाहर से घर आकर हमें शान्ति के कुछ पल प्राप्त हो सकें। हमारा आस-पड़ोस भी अपने अनुकूल परिवारों और व्यक्तियों से पूर्ण होना चाहिए, जिनके बीच आपसी सामंजस्य हो, भले ही बहुत अधिक घनिष्टता न हो। जो व्यक्ति तनावपूर्ण वातावरण में रहते हैं, उनके स्वास्थ्य पर देर-सबेर बुरा प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। इसके अतिरिक्त हमें मौसम के साथ-साथ चलना चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हम गर्मियों में गर्मी सहन करें, जाड़ों में जाड़ा सहन करें और बरसात में कभी-कभी भीगें भी। मौसम अपनी सहनशक्ति से बाहर होने पर ही हमें कूलर, एसी, हीटर आदि कृत्रिम उपायों का सहारा लेना चाहिए।

रहन-सहन के अन्तर्गत हमारे आवागमन के साधन भी आते हैं। बहुत से लोग पैदल चलने में लज्जा का अनुभव करते हैं और थोड़ी दूर सब्जी खरीदने जाने जैसे मामूली कार्यों के लिए भी कार, मोटरसाइकिल, स्कूटी आदि वाहनों का उपयोग करते हैं। एक-दो मंजिल चढ़ने के लिए सीढ़ियों की जगह लिफ्ट का प्रयोग करना भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो हमें वाहनों का उपयोग कम करना चाहिए और पैदल चलने तथा सीढ़ियों से चढ़ने उतरने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

हमारा सामाजिक व्यवहार भी स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हम समाज के एक अंग के रूप में उसके कार्यों में भाग लेते हैं, दूसरों के दुःख-सुख में उचित व्यवहार करते हैं, परिचितों से मेल-जोल रखते हैं, तो हमारे मन में एक प्रकार की प्रसन्नता और संतुष्टि का निर्माण होता है, जिसका सुपरिणाम हमें अच्छे स्वास्थ्य के रूप में प्राप्त होता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो, हमें अपनी शक्ति के अनुसार सामाजिक कार्यों में तन-मन-धन से अवश्य भाग लेना चाहिए।

स्पष्ट है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि सामान्य रूप से स्वस्थ रहने के लिए भी अपनी जीवन शैली को सही रखना चाहिए। गलत जीवन शैली का दुष्प्रभाव स्वास्थ्य पर अवश्य पड़ता है। जिन व्यक्तियों की जीवन शैली गलत होती है, भले ही वे जवानी में स्वास्थ्य पर उसके बुरे प्रभावों का अनुभव न कर पायें, लेकिन जैसे ही उनकी उम्र 40-45 के आसपास पहुँचती है, वैसे ही उनके स्वास्थ्य में अनेक समस्यायें दिखायी पड़ने लगती हैं। रक्तचाप कम या अधिक हो जाना, शुगर की शिकायत हो जाना या मूत्र सम्बंधी रोग हो जाना तो उनके लिए सामान्य बात है। इन रोगों को कोई दवा दूर नहीं कर सकती चाहे आप जीवन भर दवाइयाँ लेते रहें। लेकिन अपनी जीवन शैली में सुधार करके बहुत सरलता से इन रोगों से छुटकारा पा सकते हैं।

-- *डॉ विजय कुमार सिंघल*
प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य
मो. 9919997596

Thursday, September 12, 2019

Few Tips For Good Health And To Prevent Sickness

*कुछ 100 जानकारी जिसका ज्ञान सबको होना चाहिए*
1.योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।
2. *लकवा* - सोडियम की कमी के कारण होता है ।
3. *हाई वी पी में* -  स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे ।
4. *लो बी पी* - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें ।
5. *कूबड़ निकलना*- फास्फोरस की कमी ।
6. *कफ* - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है , फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है । गुड व शहद खाएं
7. *दमा, अस्थमा* - सल्फर की कमी ।
8. *सिजेरियन आपरेशन* - आयरन , कैल्शियम की कमी ।
9. *सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें* ।
10. *अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें* ।
11. *जम्भाई*- शरीर में आक्सीजन की कमी ।
12. *जुकाम* - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें ।
13. *ताम्बे का पानी* - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें ।
14.  *किडनी* - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये ।
15. *गिलास* एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है । गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें,  लोटे का कम  सर्फेसटेन्स होता है ।
16. *अस्थमा , मधुमेह , कैंसर* से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं ।
17. *वास्तु* के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा ।
18. *परम्परायें* वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं ।
19. *पथरी* - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है ।
20. *RO* का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता । कुएँ का पानी पियें । बारिस का पानी सबसे अच्छा , पानी की सफाई के लिए *सहिजन* की फली सबसे बेहतर है ।
21. *सोकर उठते समय* हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का *स्वर* चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें ।
22. *पेट के बल सोने से* हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है ।
23.  *भोजन* के लिए पूर्व दिशा , *पढाई* के लिए उत्तर दिशा बेहतर है ।
24.  *HDL* बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा ।
25. *गैस की समस्या* होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें ।
26.  *चीनी* के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है , यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से *पित्त* बढ़ता है ।
27.  *शुक्रोज* हजम नहीं होता है *फ्रेक्टोज* हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है ।
28. *वात* के असर में नींद कम आती है ।
29.  *कफ* के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है ।
30. *कफ* के असर में पढाई कम होती है ।
31. *पित्त* के असर में पढाई अधिक होती है ।
33.  *आँखों के रोग* - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा , आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है ।
34. *शाम को वात*-नाशक चीजें खानी चाहिए ।
35.  *प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए* ।
36. *सोते समय* रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है ।
37. *व्यायाम* - *वात रोगियों* के लिए मालिश के बाद व्यायाम , *पित्त वालों* को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए । *कफ के लोगों* को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए ।
38. *भारत की जलवायु* वात प्रकृति की है , दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए ।
39. *जो माताएं* घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं ।
40. *निद्रा* से *पित्त* शांत होता है , मालिश से *वायु* शांति होती है , उल्टी से *कफ* शांत होता है तथा *उपवास* ( लंघन ) से बुखार शांत होता है ।
41.  *भारी वस्तुयें* शरीर का रक्तदाब बढाती है , क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है ।
42. *दुनियां के महान* वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों ,
43. *माँस खाने वालों* के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं ।
44. *तेल हमेशा* गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का , दूध हमेशा पतला पीना चाहिए ।
45. *छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है ।*
46. *कोलेस्ट्रोल की बढ़ी* हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है । ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है ।
47. *मिर्गी दौरे* में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए ।
48. *सिरदर्द* में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें ।
49. *भोजन के पहले* मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है ।
50. *भोजन* के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें ।
51. *अवसाद* में आयरन , कैल्शियम , फास्फोरस की कमी हो जाती है । फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है
52.  *पीले केले* में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है । हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है । हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है ।
53.  *छोटे केले* में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है ।
54. *रसौली* की गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं ।
55.  हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है ।
56. *एंटी टिटनेस* के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे ।
57. *ऐसी चोट* जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें । बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें ।
58. *मोटे लोगों में कैल्शियम* की कमी होती है अतः त्रिफला दें । त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं ।
59. *अस्थमा में नारियल दें ।* नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है ।दालचीनी + गुड + नारियल दें ।
60. *चूना* बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है ।
61.  *दूध* का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है ।
62.  *गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है ।*
63.  *जिस भोजन* में सूर्य का प्रकाश व हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए
64.  *गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें ।*
65.  *गाय के दूध* में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है ।
66.  *मासिक के दौरान* वायु बढ़ जाता है , 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे  गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है । दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें ।
67. *रात* में आलू खाने से वजन बढ़ता है ।
68. *भोजन के* बाद बज्रासन में बैठने से *वात* नियंत्रित होता है ।
69. *भोजन* के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए । बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा ।
70. *अजवाईन* अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है
71. *अगर पेट* में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें
72. *कब्ज* होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए ।
73. *रास्ता चलने*, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए ।
74. *जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है ।*
75.  *बिना कैल्शियम* की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है ।
76. *स्वस्थ्य व्यक्ति* सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है ।
77. *भोजन* करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है ।
78. *सुबह के नाश्ते* में फल , *दोपहर को दही* व *रात्रि को दूध* का सेवन करना चाहिए ।
79. *रात्रि* को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए । जैसे - दाल , पनीर , राजमा , लोबिया आदि ।
80.  *शौच और भोजन* के समय मुंह बंद रखें , भोजन के समय टी वी ना देखें ।
81. *मासिक चक्र* के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान , व आग से दूर रहना चाहिए ।
82. *जो बीमारी जितनी देर से आती है , वह उतनी देर से जाती भी है ।*
83. *जो बीमारी अंदर से आती है , उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए ।*
84. *एलोपैथी* ने एक ही चीज दी है , दर्द से राहत । आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी , लीवर , आतें , हृदय ख़राब हो रहे हैं । एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है ।
85. *खाने* की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए , ब्लड-प्रेशर बढ़ता है ।
86 .  *रंगों द्वारा* चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें , पहले जामुनी , फिर नीला ..... अंत में लाल रंग ।
87 . *छोटे* बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए , क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है , स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए
88. *जो सूर्य निकलने* के बाद उठते हैं , उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है , क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है ।
89.  *बिना शरीर की गंदगी* निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है , मल-मूत्र से 5% , कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं ।
90. *चिंता , क्रोध , ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज , बबासीर , अजीर्ण , अपच , रक्तचाप , थायरायड की समस्या उतपन्न होती है ।*
91.  *गर्मियों में बेल , गुलकंद , तरबूजा , खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली , सोंठ का प्रयोग करें ।*
92. *प्रसव* के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है । बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती  है ।
93. *रात को सोते समय* सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा
94. *दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं , हमें उपयोग करना आना चाहिए*।
95. *जो अपने दुखों* को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है , वही मोक्ष का अधिकारी है ।
96. *सोने से* आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है , लकवा , हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है ।
97. *स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है*।
98 . *तेज धूप* में चलने के बाद , शारीरिक श्रम करने के बाद , शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है
99. *त्रिफला अमृत है* जिससे *वात, पित्त , कफ* तीनो शांत होते हैं । इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना ।  देशी गाय का घी , गौ-मूत्र भी त्रिदोष नाशक है ।
100. इस विश्व की सबसे मँहगी *दवा। लार* है , जो प्रकृति ने तुम्हें अनमोल दी है ,इसे ना थूके ।

Tuesday, August 20, 2019

सुविधा जनक मल मूत्र विसर्जन हेतु आसान उपाय

*शालीनता से जीयें / Ageing Gracefully*
                                भाग – XIX
                       --- By Sri जगमोहन गौतम
        *सुविधा जनक मल मूत्र विसर्जन हेतु आसान उपाय*

मित्रों,
*मल-मूत्र का स्वाभाविक रूप से  निष्कासन स्वास्थ का बैरोमीटर है।* इसके पूर्व हम Ageing Gracefully श्रृंखला के अंतर्गत स्वस्थ रहने के लिए कब, कैसे और क्या खाएं, क्या न खाएं एवं क्या अवश्य खाएं पर प्रकाश डाल चुके हैं। _शरीर के निष्कासन की क्रियाएं इस बात पर निर्भर करती हैं कि हम क्या खा रहे हैं।_ यहां में पुरातन समय के जीवन चर्या Life Style  विशेषज्ञ एवं जन साधारण के प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य महर्षि बागभट जी के कथन *शरीर को जानिये, भोजन को पहचानिये* पर आपका ध्यान इस आशय से ले जा रहा हूँ कि भोजन क्या हो ? -- पर आप अपने शरीर के अनुसार, अपने नैसर्गिक गुणों का उपयोग करते हुए, स्वयं स्वस्थ रहने के लिए भोजन को पहचान कर इसका उपयोग करें। लाइफ स्टाइल के इन परखे नियमों को हम जीवन चर्या में ढाल ले तो स्वस्थ रहने के लिए यदि एक और हम आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति कर सकते हैं तो वहीं दूसरी और अनावश्यक पदार्थों को बाहर निकालने में भी सक्षम हो सकते हैं।

परंतु आज खान पान एवं दिन चर्या मैं आये हुए बदलाव के कारण मल मूत्र निष्कासन एक समस्या बन गया है जिसने अनेक असाध्य रोगों को जन्म दे दिया है। आयुर्वेद एवम प्राकृतिक चिकित्सा पद्यतियों में मल मूत्र विसर्जन सुगम न होना किसी भी रोग का मूल कारण माना गया है। आधुनिक जीवन शैली मैं आये आमूल परिवर्तन के कारण आज अधिकांश लोग मल-मूत्र विसर्जन की सुगमता के आनंद से वंचित होते जा रहे हैं। इसको लेकर नई पीढ़ी की उदासीनता बढ़ती जा रही है एवं विसर्जन कहीं भी, कभी भी के सिद्धांत का पालन कर रही है, जो भारतीय संस्कृति एवम मानवीय आवश्यकताओं से एक और मेल नहीं खाता है तो दूसरी और यह  गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है।

 अतः हम आज आपको उन उपायों से अवगत कराएंगे, जिनको यदि अपनाया जाय तो मल मूत्र निस्तारण सुगम होकर हमको शालीनता से जीवन व्यतीत करने की और ले जाएगा। हमारे सुझावों को अपनाने से पूर्व अपनी स्थिति स्पष्ट कर लें कि कहीं आप किसी असाध्य रोग के शिकार तो नहीं है, अतः डॉक्टर की सलाह अवश्य ले लें। -- जल का सेवन कम से कम 3-4 लीटर प्रति दिन अवश्य करें। प्रति घंटे आधे मैं एक गिलास जल अवश्य घूंट घूंट लेके पीते रहें। भोजन करने के एक घण्टे पूर्व एवम एक घण्टे के बाद ही जल पीएं। (देखें Ageing Gracefully के 6-ख में जल पीने के नियम)

1.  प्रात उठते ही बिना कुल्ला किये 2 से 3 गिलास जल/ करीब करीब सवा लीटर जल अवश्य पीएं। यदि गुनगुना जल हो एवं आधा नींबू निचोड़ा हो एवम 2 चम्मच शहद हो तो ज्यादा अच्छा। मुहँ में 10-20 सेकंड तक कुल्ला बनाकर घूंट घूंट बैठ कर ही जल पीएं।

2. नीचे क्रम 3,4,5, में बताए गए उपायों मैं से एक नियम को अपनाएं एवं कुछ दिनों तक उपयोग करें।

3.  रात्रि में सोते समय, किसी कटोरे में दूध लीजिए, इसमें देशी खांड (यदि मधुमेह नहीं है) एवं दो चम्मच ईसबगोल डाले और चम्मच से घुमाकर तुरंत पी जाएं। यह आवश्यक नहीं है कि इसबगोल दूसरे दिन प्रातः ही अपना असर दिखा दे, यह कल शाम अथवा परसों सुबह भी अपना असर दिखा सकती है। अतः प्रतिदिन लेने पर एक चक्र सा बन जाता है।

4. एक चम्मच त्रिफला चूर्ण फंकी मारकर ऊपर से गर्म दूध रात को सोने से पहले ले लें। 

5. रात्रि में सोते समय एक चम्मच देशी गाय का घी, एक ग्लास गर्म दूध में खूब मिलाकर पी लें। 

6. चूंकि मल विसर्जन की समस्या का मुख्य कारण कब्ज है, अतः जिनके लम्बे समय से कब्ज है, वो 1 से 2 चम्मच अरण्डी का तेल गुनगुने दूध अथवा जल दिन मैं एक दो बार लें लेकिन  लम्बे समय तक एवम निरन्तर इसको न दोहराएं

7. यदि इसके बाद भी प्रातः मल विसर्जन का प्रेशर नहीं बन रहा है तो आगे की सूचना के अनुसार  ग्रीवा कटि व्यायाम/आसन करें एवं इसी मध्य जब भी जल पीने के पूर्व,मध्य अथवा बाद में, आसन से पूर्व, अथवा मध्य में जब भी मल विसर्जन की इच्छा हो तत्काल इन कार्यो को छोड़कर मल विसर्जन हेतु जाएं।

यदि ऊपर बताए उपायों को अपनाया जाता है तो अधिकतर व्यक्तियों की मल निष्कासन समस्या  हल हो जाएगी। यदि इन उपायों के बाद भी समस्या बनी रहती है तो हम  पांच योगासन बता रहे हैं जिनको क्रम वार करना होगा एवं अंतिम आसन के पूर्व ही अवश्य आपको विसर्जन हेतु भागेंगे। साथ मैं कुछ अन्य उपायों के साथ एक प्राणायाम व एक बंध के अभ्यास की क्रिया भी बता रहे है, ताकि जो मित्र इस समस्या से जूझ रहे है वे भी सुगमता का अनुभव कर सके।

8.  प्रात जल पीने के पश्चात क्रम से निम्न आसान/व्यायाम दो दो बार करें, हमारा विश्वास है कि आप इन आसनों का दूसरा क्रम प्रारम्भ नहीं कर पायेगें की आप प्रेशर अनुभव करेंगे एवं तत्काल विसर्जन हेतु जाएंगें, यदि अब भी प्रेशर न बने तो आसनों को क्रम वार दोहरा लें।।           
    *आसन*                           

*पहला आसान* सीधे खड़े हों, दोनों पैरों के मध्य एक -डेढ़ फुट का फासला। दोनों भुजाएं आकाश की और, दोनों हाथों की उंगलियों को परस्पर फसाते हुए, हथेलियों का रुख आकाश की और करें। ऊपर की और भुजाओं को स्वांस भरते हुए खींचे, फिर क्रमशः दाहिनी ओर व बायीं और  स्वांस निकालते  हुए झुकें। देखें चित्र 1 व 2 में।।     
                         *दूसरा आसन* दोनों पैरों के मध्य एक डेढ़ फुट की दूरी रखकर खड़े हों, दाहिनी हथेली बाएं कंधे पर रखे, बायीं हथेली कमर पर और गर्दन अधिक से अधिक बायीं मोड़कर बायीं और देखें। इसके पश्चात इसका उल्टा करें। देखें चित्र 3 से 6।।

 *तीसरा आसन* पेट के बल लेट जाएं, कोहिनियाँ सीधी करते हुए नाभि से ऊपर के शरीर के हिस्से को उठाएं एवम स्वांस भरते हुए दाहिने गर्दन मोड़ते हुए बाए पेर की एड़ी देखे स्वांस खाली करते हुए वापस,  फिर इसी प्रकार बाएं गर्दन मोड़ते हुए देखें। देखें चित्र 7 ।   

                   *चौथा आसन*  पैरों को खोलकर, पंजों के बल उकड़ू बैठें, दोनों हथेलियां पृथ्वी पर, पहले दाहिना घुटना बायीं और पृथ्वी पर रखे फिर बायां घुटना दायीं और पृथ्वी पर रखे। देखे चित्र 8।.         

 *पांचवा आसन*  करें चित्र 9 व 10 के अनुसार            इन आसनों को क्रम वार दोहराएं। हम अपने अनुभव एवम अनेक लोगों पर किये गए प्रयोग के आधार पर गारंटी से कह सकते हैं कि मल विसर्जन सुगमता से होगा ही। 
               

कब्ज़ सदैव मल विसर्जन मैं व्यवधान उत्पन्न करती है। अतः रेशेदार fiber युक्त भोजन के साथ हरी सब्जियों का, क्षारीय खाद्य पदार्थों का अधिक उपयोग करें एवम निम्न आयुर्वेदिक नियमों का पालन करें।     
                       
  1. भोजन भली प्रकार चबा चबा कर करें।                             
  2. भोजन करने का समय, निम्न अनुसार सुनिश्चित करें। नाश्ता 8 बजे के आसपास किसी मौसमी फल से प्रारम्भ करें एवं स्वादानुसार  लें।  लंच 1 बजे के आसपास लें छाछ अवश्य लें। डिनर 7 बजे से पूर्व हल्का यथा दलिया, खिचड़ी, उपमा इत्यादि ले एवम भर पेट न लें। 
            
3. चाय/कॉफ़ी का सेवन न करें।।       

4. भोजन करने से आधा पोन घंटे पहले पानी पिएं। सर्दी में भोजन के डेढ़ घण्टे बाद एवम गर्मी में 1 घण्टे बाद ही पानी पीएं।।       
                       
5. प्रात सूर्य उगने से पूर्व ही शौच कर लें क्योंकि इसके बाद मल निष्कासन कार्य धीमा हो जाता है। ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक शरीर, मल निष्कासन कार्य सुगमता से करता है अतः इस समय का उपयोग इस कार्य हेतु करें।                                   
6. प्रतिदिन मल द्वार के भीतर तक मध्यमा उंगली से सरसों अथवा नारियल का तेल इस प्रकार लगायें कि लगभग आधा चम्म्च तेल मल द्वार के भीतर पहुंच जाए। यह नियम स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी  उपयोगी है।

7. प्रातः शौच से निवर्त होने के पश्चात, पेड़ू पर ठंडे पानी का 3-4 मिनेट तक पोंछा लगाएं एवम तत्पश्चात व्यायाम, योग अथवा घूमने के लिए जाय।

   आंतों में मल विसर्जन की स्वाभाविक शक्ति बढ़ाने एवम पाचन तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए मल विसर्जन के पश्चात अग्निसार प्राणायाम एवम उड्डीयान बंध का नित्य अभ्यास करें। (इन पर विस्तृत जानकारी प्राप्ति हेतु हमको लिखें) जो मित्र कब्ज से ग्रसित है वो निम्न उपचार भी अपनाएं।। 

                        *1* अंगूर में कब्ज निवारण गुण है अतः जब तक अंगूर बाजार में उपलब्ध हैं, इसका नियमित उपयोग करते रहे। शेष समय किशमिश पानी में कम से कम 3 घंटे गला कर खाने से आंतों को ताकत मिलती है एवम मल विसर्जन आसानी से होती है।     

 *2* नीम्बू कब्ज में लाभकारी है। गुनगुने पानी में नीम्बू निचोड़ कर दिन में 2-3 बार सेवन करें। नीम्बू का रस गर्म पानी के साथ रात मैं लेने से दस्त साफ आता है एवम पुरानी से पुरानी कब्ज दूर होती हैं                       

  *3*  जल्दी सुबह उठकर मामूली गर्म, 1 लीटर पानी पीकर 2-3 किलोमीटर घूमने जाएं, यह कब्ज का बेहतरीन उपाय है।

                          *4* अमरूद व पपीता, ये दोनों ही फल कब्ज के लिए अमृत समान है, इनका दिन में कभी भी सेवन कर सकते हैं, इससे मल विसर्जन सुगम होता है।।     

                 *5*  दो सेब apple प्रति दिन खाने से भी कब्ज में लाभ होता है।

*6* दही, अंजीर एवम अलसी का उपयोग नित्य करें।             
जिस किसी मित्र को और स्पष्टीकरण व विस्तृत जानकारी इस विषय में चाहिए , उसका स्वागत है।   

                 ~

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